Sunday, January 29, 2017

दिसम्बर की छत

#दिसम्बर_की_छत

'दिसम्बर, साल का अंतिम महीना , पर  यह महीना मेरी नज़र में अंत नहीं शुरुआत का महीना है। किस्से कहानियो एवं नज़रो नज़ारो का महीना है। इस महीने में ठण्ड अपने परवान पर होती है। कॉलेजी उम्र के लिए तो इस महीने में सुबह होती ही नहीं है, सुरुज देव सीधे दोपहर लेकर आते हैं।
                      पर हमारे बिहार में हम बड़े शौक से ठण्ड का इंतज़ार करते हैं, क्योकि ये महीना हमे छत के नीचे से रेस्क़यू करके छत के ऊपर लाता है।
                      रात भर की ओस और 5-6 ℃ की ठण्ड के बाद धुंधले से बादलों के बीच से फटौस हवाओ को चीरते हुए धूप जब हमारे छत पर पड़ती होगी तो शायद छत भी बिल्कुल वैसे ही तृप्त हो जाती होगी जैसे पानी के बगैर छटपटाती मछली को पानी मिल गया हो,  मंजिल की आस में बेसुध होकर चल रहे इंसान को मंज़िल मिल गयी हो, पिया के इंतज़ार में जी रही उस जान को उसकी रूह मिल गयी हो। शायद छत ने भी समेट लिया होगा धूप को अपनी बाहों में कस कर।
                     ठण्ड में अक्सर ही ऐसी धुप को सेकते लोग अपनी दोपहर छतों पर गुज़ारते हैं। पर छत पर धुप तीन तरह के लोग सेकते हैं। पहले वो जिन्होंने ज़िन्दगी में सब पा लिया है और अब कुछ बचा नही है उनके लिए नया करने को। दूसरे वो होते हैं जिन्हें ज़िन्दगी से ज्यादा कुछ या कुछ भी उम्मीद नही होती, और अपने बेगारी के दिनों में थोड़ी धुप लगाना और यहाँ की बाते वहां करना ही उनका मुख्य पेशा हो गया है। और तीसरे होते हैं वो जो हर वक़्त थोरे और की उम्मीद में रहते हैं। आशिक़ और मिज़ाज़ वाले लोग। जिन्हें आसमान देखना होता है, सूखते बाल देखने होते हैं, उड़ती पतंगे देखनी होती हैं और थोड़ी फिलॉसफी झारनी होती है।
हमारे टाइप वाले।
             इसी ठण्ड की दोपहरी में मैं लेकर आ रहा हूँ,  #दिसम्बर_की_छत ।
        एक श्रृंखला जिसमे मैं रूबरू कराऊँगा आपको अपने एवं आपके छत से, थोड़े करीब से। हर दो दिन पर एक भाग।
क्योंकि छत गिट्टी बालू और छड़ से आगे भी कुछ है।

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