नास्तिकता
धर्म के विरोध में लेखन मरते दम तक चौकाने वाला विवादास्पद आधुनिक झझकोरनेवाला और विद्रोही होता है ।
मैं कोई लेखक नहीं हूं ,ना ही कोई दार्शनिक ग्रेजुएशन कर रहा हूं पर इतनी दुनिया जरूर देखी है कि सही गलत का फैसला कर सकूं ।यहां मैं जो भी विचार प्रकट कर रहा हूं वह पूरी तरह से वास्तविक जीवन एवं घटनाओं से प्रेरित है ,एवं बहुत हद तक मेरे स्वयं के अनुभव से भी प्रेरित है ।
"धर्म", एक ऐसा विवादित संगठन, जिसे सब अपने-अपने तरीके से परिभाषित करते हैं मैं भी इसे अपनी तरह से परिभाषित करना चाहूंगा । 'धर्म ऐसे अव्यवहारिक नियमों एवं तर्कों का समूह है ,जो मनुष्य को अपनी चेतना शक्ति को शुन्य कर बेतुके नियमों पर चलने को विवश करता है'।
अब प्रश्न उठता है कि लेखन की शुरुआत उस काल्पनिक ईश्वर से ना कर के धर्म से क्यों की गई ।इसके पीछे भी सामान्य सा तर्क यह है कि ईश्वर तो काल्पनिक है ।उसकी शक्तियां एवं किस्से भी बनावटी हैं। पर अगर कोई इन शक्तियों , किस्सों एवं ईश्वर को सत्य साबित करने पर तुला हुआ है तो वह है धर्म ।ईश्वर तो केवल इन धार्मिक हाथों की कठपुतलियां हैं ।इसलिए लेखन की शुरुआत धर्म से की गई है अक्सर लोगों को अपने धर्म के प्रति इतना निष्ठावान देखा जितना वह अपने माता पिता के लिए भी नहीं है मुझे इसके पीछे का तर्क समझ नहीं आता वह चीज जिसे आपने अपने जन्म के बाद खुद से चुना भी नहीं । वह चीज जो आप पर जन्म के 1 मिनट बाद ही आपके नामकरण के साथ ही थोप दी गई। उसके प्रति इतनी निष्ठा और वह माता पिता जिनसे आप की उत्पत्ति हुई, वह समाज जिसमें आपका भरणपोषण हुआ उसके प्रति निष्ठा कहां गई ?आज अगर कोई व्यक्ति आपके सामने दम तोड़ रहा हो तो क्या आप उसकी सहायता नहीं करेंगे ?निश्चित करेंगे क्योंकि आपके अंतर्मन ने यह जानने की इच्छा प्रकट नहीं की ,कि अमुक व्यक्ति किस जाति या धर्म का है पर अगर उसी व्यक्ति को आप धर्म रूपी चश्मे से देखें तो आप एक बार जरूर यह सोचेंगे कि यह वही व्यक्ति है जिसने कभी गाय या सूअर का मांस खाया होगा ।क्या गाय या सूअर के मांस खा लेने से वह व्यक्ति मानव नहीं रहा क्या उस कृत्य से वह समाज से परित्यक्त हो गया ?नहीं ।आपके धर्म ने उस व्यक्ति को अपने प्रति उदासीन समझा इसलिए वह व्यक्ति जो किसी दूसरे धर्म का है आपने उसकी सहायता नहीं की आप की धार्मिक निष्ठता ,आपके समाजिक जिम्मेदारी पर भारी पर गई ।
मेरा मानना है कि 'धर्म और ईश्वर मनुष्य द्वारा रचित सबसे भयावह रचना है '।ऐसा इसलिए क्योंकि आज का मनुष्य बटा हुआ है ।पर जो चीज़ इसमें खास है वह यह है कि बटवारे का आधार व्यंग्यात्मक है ।जैसे ब्राह्मण, क्षत्रिय ,वैश्य, शूद्र ,हिंदू ,मुस्लिम ,सिख, ईसाई, बौद्ध ,जैन ,शिया ,सुन्नी ,कैथोलिक ,प्रोटेस्टेंट, तिब्बती, चीनी ,पूर्वी, पश्चिमी, बौद्ध, फिर जातियां ,फिर कोटियां, फिर वर्ग ।
पर क्या वाकई मानव इतना बंटा ही पैदा हुआ होगा? सोचियेगा ज़रूर।
"धर्म", एक ऐसा विवादित संगठन, जिसे सब अपने-अपने तरीके से परिभाषित करते हैं मैं भी इसे अपनी तरह से परिभाषित करना चाहूंगा । 'धर्म ऐसे अव्यवहारिक नियमों एवं तर्कों का समूह है ,जो मनुष्य को अपनी चेतना शक्ति को शुन्य कर बेतुके नियमों पर चलने को विवश करता है'।
अब प्रश्न उठता है कि लेखन की शुरुआत उस काल्पनिक ईश्वर से ना कर के धर्म से क्यों की गई ।इसके पीछे भी सामान्य सा तर्क यह है कि ईश्वर तो काल्पनिक है ।उसकी शक्तियां एवं किस्से भी बनावटी हैं। पर अगर कोई इन शक्तियों , किस्सों एवं ईश्वर को सत्य साबित करने पर तुला हुआ है तो वह है धर्म ।ईश्वर तो केवल इन धार्मिक हाथों की कठपुतलियां हैं ।इसलिए लेखन की शुरुआत धर्म से की गई है अक्सर लोगों को अपने धर्म के प्रति इतना निष्ठावान देखा जितना वह अपने माता पिता के लिए भी नहीं है मुझे इसके पीछे का तर्क समझ नहीं आता वह चीज जिसे आपने अपने जन्म के बाद खुद से चुना भी नहीं । वह चीज जो आप पर जन्म के 1 मिनट बाद ही आपके नामकरण के साथ ही थोप दी गई। उसके प्रति इतनी निष्ठा और वह माता पिता जिनसे आप की उत्पत्ति हुई, वह समाज जिसमें आपका भरणपोषण हुआ उसके प्रति निष्ठा कहां गई ?आज अगर कोई व्यक्ति आपके सामने दम तोड़ रहा हो तो क्या आप उसकी सहायता नहीं करेंगे ?निश्चित करेंगे क्योंकि आपके अंतर्मन ने यह जानने की इच्छा प्रकट नहीं की ,कि अमुक व्यक्ति किस जाति या धर्म का है पर अगर उसी व्यक्ति को आप धर्म रूपी चश्मे से देखें तो आप एक बार जरूर यह सोचेंगे कि यह वही व्यक्ति है जिसने कभी गाय या सूअर का मांस खाया होगा ।क्या गाय या सूअर के मांस खा लेने से वह व्यक्ति मानव नहीं रहा क्या उस कृत्य से वह समाज से परित्यक्त हो गया ?नहीं ।आपके धर्म ने उस व्यक्ति को अपने प्रति उदासीन समझा इसलिए वह व्यक्ति जो किसी दूसरे धर्म का है आपने उसकी सहायता नहीं की आप की धार्मिक निष्ठता ,आपके समाजिक जिम्मेदारी पर भारी पर गई ।
मेरा मानना है कि 'धर्म और ईश्वर मनुष्य द्वारा रचित सबसे भयावह रचना है '।ऐसा इसलिए क्योंकि आज का मनुष्य बटा हुआ है ।पर जो चीज़ इसमें खास है वह यह है कि बटवारे का आधार व्यंग्यात्मक है ।जैसे ब्राह्मण, क्षत्रिय ,वैश्य, शूद्र ,हिंदू ,मुस्लिम ,सिख, ईसाई, बौद्ध ,जैन ,शिया ,सुन्नी ,कैथोलिक ,प्रोटेस्टेंट, तिब्बती, चीनी ,पूर्वी, पश्चिमी, बौद्ध, फिर जातियां ,फिर कोटियां, फिर वर्ग ।
पर क्या वाकई मानव इतना बंटा ही पैदा हुआ होगा? सोचियेगा ज़रूर।
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1 Comments:
मैं तुम्हारी बात से सहमत हूँ धर्म इंसानो के बीच फुट डालती है और मानवता को संकुचित करती है। जहाँ मानवता है वहां धर्म की कोई जरुरत नहीं और जहाँ धर्म है वहां संपूर्ण मानवता हो ही नहीं सकती। धर्म ने मानवता जैशे शब्द को जकङ कर रखा है और मानव जाति की सम्पूर्ण स्वत्रंता को भी सिमित कर रखा है जैशे यदि मैं किसी एक धर्म का हूँ तो मेरी अपनी सीमा है यदि मैं इससे बहार जाकर कुछ करता हूँ तो मैं धर्म विरोधी हूँ। धर्म एक ऐसा बंधन है जिसे आपके जन्म के साथ ही आपको बांध दिया जाता है। जिसमे आपको जिंदगी भर घुटना होता है।
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