मेरी पहली वैचारिक हार मेरे लोकतंत्र को मुबारक हो
मैं कौन हूं ? खुद से जब यह सवाल करता हूं , तो हर बार बस एक ही उत्तर मिलता है। एक हारा हुआ लाचार आदमी।
पर ये उपाधि मैंने स्वयं को पहले से नहीं दी थी । बल्कि वर्तमान सिस्टम पर मेरा पहला वार उल्टा मुझ पर भारी पड़ गया। जब मैं शांत था, सिस्टम के हिसाब से चल रहा था। तब तक चीजें सामान्य थी । पर सिस्टम पर किए गए पहले सवाल ने, मेरे लिए सब बदल दिया।
एक सामान्य आदमी कितना कमजोर हो सकता है ,यह मुझे अंदाजा लग गया। देश कितना खोखला है अंदर से बिल्कुल एक ग्लोब की तरह यह भी मुझे अंदाजा लग गया।
मैं बात कर रहा हूं अपने गृह पंचायत सिंघेश्वर की। बिहार के मधेपुरा जिला से 6 किलोमीटर दूर । दरअसल छुट्टियों में मैं घर आया हुआ था । सोचा अब रामनवमी के बाद ही जाऊंगा। एक दिन यूं ही मां ने बताया कि गैस खत्म हो गया है । मैंने गैस एजेंसी में पता लगाया तो पता लगा कि शाम को गैस की गाड़ी आने वाली है ।शाम को मैंने गैस ले लिया । पर थोड़ा आश्चर्य हुआ की गैस के दाम मुझसे 860 लिए गए। दूसरों से पूछा तो यह जाना कि उन से 880 या कभी 870 भी लिए जाते हैं । और बदले में न कोई स्लीप न कोई कैश मेमो दिया जाता है।
Google किया तो देखा कि बिहार में वर्तमान गैस के दाम ₹824 थे। मतलब मेरे शहर में हर उपभोगता से 36से56 रुपए तक मनमानी वसूली हो रही थी। एजेंसी फोन करके पूछा तो उन्होंने बताया कि गैस के दाम बढ़े हैं ।उपभोक्ताओं से सही पैसे लिए जा रहे हैं ।
पर मैं इस जवाब से संतुष्ट नहीं था। मैंने ट्विटर पर धर्मेंद्र प्रधान , मिनिस्ट्री ऑफ पेट्रोलियम एंड नेचुरल गैस तथा इंडेन गैस ऑनलाइन को मेंशन करते हुए अपनी बात बताई । 2 घंटे बाद मुझे रिप्लाई आया । सरकार का ड्यूरेशन ऑफ़ रिस्पांस देख कर खुशी हुई । उन्होंने मेरी बात लोकल अथॉरिटी तक पहुंचा दी।मैंने भी उन्हें अपना कंजुमर नंबर तथा कांटेक्ट नंबर दिया। पर उससे कुछ नहीं हुआ। मुझे लगा कि लोकल लेवल पर आ कर बात दब गई। लेकिन उसके अगले दिन मतलब कंप्लेंट के तीसरे दिन । दोपहर को जब मैं घर पर नहीं था ।तब दो लोग घर पर आए । और मेरे बारे में मां से पूछा । मैं घर पर नही था इसलिये माँ ने उन्हें थोड़ी देर बाद आने को कहा। क्योंकि माँ को इन बातों के बारे में कुछ पता नहीं था। शाम को मैं घर आया तो माँ ने पूछा कि क्या तुमने गैस एजेंसी में कोई कंप्लेन किया है । कुछ लोग आए थे तुम्हें ढूंढने । मैंने बताया कि हां मैंने कंप्लेंट किया था । थोड़ी देर बाद मुझे एक कॉल आया। यह कॉल गैस एजेंसी के मालिक का था । उन्होंने मुझे गैस ऑफिस पर बुलाया। मैंने बताया कि मैं घर पर ही हूं , थोड़ी देर में आता हूं ।
फिर यह बात भी मैंने घर पर मां को बताई। पापा घर पर नहीं थे ,माँ घबरा गई। उन्होंने मुझे जाने से मना किया। मां अब गुस्से में थी ।और मुझे डांटते हुए बोली की गैस एजेंसी का मालिक कई सारे अपराध में लिप्त है। यह गैस एजेंसी भी उसकी दहशत का ही नतीजा है ।
हम बातें कर ही रहे थे कि दो लोग दरवाजे पर आए ,और मेरा नाम लेने लगे । मैंने उन्हें अंदर बुलाया और हमारी बातचीत शुरू हुई ।
पहला आदमी - तुमने ही कंप्लेन की थी?
मैं- हां।
पहला आदमी- क्यों ?
मैं- मुझे लगा कि मुझसे ज्यादा पैसे लिए गए । और बदले में कोई स्लिप या कॅश मेमो नहीं दिया गया। इस कारण मुझे अंदाजा नहीं लग रहा था कि गैस के दाम बढे हैं या नही।
पहला आदमी -तो तुम सीधे मेल कर दोगे ? इसलिए पढ़ाया गया है तुम्हें। तुम्हें पहले एजेंसी फोन करना चाहिए था ।
मैं- मैंने फोन किया था। उन्होंने कहा कि दाम बढ़ गए हैं।
पहला आदमी- शुक्र करो कि तुम्हारे पापा से जान पहचान है। तुम्हारे अलावा कोई और रहता तो बात मालिक तक जाती भी नहीं । इस तरह करोगे तो मां पापा के लिए परेशानी होगी।
मां घबरा रही थी ,और यह घबड़ाहट उनके चेहरे से साफ झलक रही थी। दूसरा आदमी- चलो चलकर कंप्लेंट वापस ले लो । मैं फिर बाइक से तुम्हें घर छोड़ दूंगा
मां की घबड़ाहट देख मैं खुद भी डर गया । यह सब मेरे साथ पहली बार हो रहा था। फिर भी मैं उनके साथ गैस एजेंसी जाने लगा ।
वहां पहुंचा तो गैस एजेंसी के मालिक ने मुझे अपनी राजनीतिक पहुंच बताई । बताया कि उसने कई डीएम एसपी तक का तबादला करा दिया है। मैं अभी बहुत छोटा हूं। ऐसी-ऐसी कई कंप्लेंट आई और गई पर उसका कुछ नहीं बिगड़ा । उसने मुझसे कंप्लेंट वापस लेने को कहा ।
मेरे सामने मेरी मां का वह डरा हुआ चेहरा था । मैं लाचार था।
उसने मुझसे एक आवेदन लिखवाया। अपनी मर्जी से । आवेदन ये की कैश मेमो मेरे घर पर मेरी मां को दिया गया था , जिसके मुताबिक गैस का दाम सही था। और मुझे इसकी जानकारी नहीं थी । फिर मेरे सिग्नेचर भी लिए ।
इस आवेदन का एक-एक शब्द मेरी वैचारिक हार थी । इसके एक एक शब्द ने लोकतंत्र तथा कानून व्यवस्था पर तमाचा जड़ा था।
मैं वापस घर आ गया । बात आग की तरह गांव में फैल गई। कई लोग आए घर पर । सब को यही लगा की गैस एजेंसी वाले मुझे उठा कर ले गए थे । सबने एक ही बात कही की क्यों यह सब कर रहे हो। सब कोई देते हैं ना बढ़े हुए दाम । जो वह बोलते हैं वह देना ही पड़ेगा । वे लोग दबंग हैं। राजनीति में सक्रिय हैं । इग्नोर करना सीखो। जिंदगी ऐसे नहीं चलती। समाज में रहना है तो इसके हिसाब से चलना होगा । अभी इन सब में मत पड़ो अपने करियर पर ध्यान दो। यह अंतिम बात थी जो मैंने उस दिन की। सब के सब मुझे लाचार लग रहे थे । सब साथ खड़े होने के बावजूद अकेले लग रहे थे ।
तबसे यह लिखने तक मैं अंदर ही अंदर चित्कार रहा हूं। इस चीख को सुनने वाला कोई नहीं । देश और समाज का एक हिस्सा होने के नाते मुझे अपनी औकात का अंदाजा लग गया ।
आज अपराधी होना आसान है पर विद्रोही नहीं ।
मेरी पहली वैचारिक हार मेरे लोकतंत्र को मुबारक हो। अगर समाज में जीना है तो ऐसी वैचारिक हारों की आदत डालनी होगी।

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