मुझे आज़ादी नही चाहिए, बस गुलामियों से छुटकारा दिला दो।
अगर तुम भी आज़ादी के लिए लड़ रहे हो या इसका समर्थन कर रहे हो, तो हां बेवकूफ हो तुम। क्योंकि लड़ने से कभी आज़ादी नहीं मिलती। बस गुलामी शिफ्ट हो जाती है, जैसा कि अब तक होता आया है। हम जानवर थे। खुद से लड़े तो इंसान बन गए, अपने ही दिमाग़ के गुलाम। फिर एक दूसरे से लड़े और एक दूसरे के गुलाम। फलाना व्यक्ति फलाने का गुलाम। फलाना राज्य फलाने का गुलाम। फलाना देश फलाने का गुलाम। हम भी गुलाम थे। फिर हमने आज़ादी की लड़ाई लड़ी और आखिर 15 अगस्त 1947 को हम… आजाद नहीं हुए, बल्कि इस दिन हमारी गुलामी शिफ्ट हो गई।
हम अब अंग्रेजों के गुलाम नहीं रहे, अब हम खुद के द्वारा चुने गए बेवकूफों के गुलाम हो गए। अब चलते हैं थोड़े पीछे, बाप-दादाओं वाले पीछे नहीं। मतलब बहुत्ते वाले पीछे, एवोलुशन वाले टाइम में। सोचता हूं कि जब जीवन इस ग्रह पर आया होगा या जब पृथ्वी बनी होगी, तो क्या तब भी भारत पाकिस्तान अमेरिका या दूसरे देश यूंही बॉर्डर बनाकर खड़े होंगे? ‘नहीं’ यही जवाब होगा शायद आपका भी।
तब से लेकर अब तक, हम गुलाम ही हैं। हम अपने-अपने देशों में एक ऐसी ज़मीन के टुकड़े के लिए लड़ रहे हैं जो असल में टुकड़ा है ही नहीं। यह तो धरती है जैसी भारत की है वैसी पाकिस्तान की, जैसी चीन की है वैसे ही रूस की। उस टुकड़े की राष्ट्रभक्ति के पीछे न जाने कितनी ही जाने गई है अब तक। हम एक ऐसे धर्म के गुलाम हैं जो हमने खुद से चुना भी नहीं है, हमारी ही तरह किसी आदमी ने धर्मों को बनाया और उस काल्पनिक धर्म की रक्षा के पीछे न जाने कितने ही दंगे हुए।
क्या हम ऐसे ही आए होंगे पृथ्वी पर? क्या प्रकृति ने हमें यूं ही बांट कर भेजा होगा? क्या हम भारतीय, अमेरिकी, पाकिस्तानी या अन्य देशों के न होकर एक बेहतर विश्व के नागरिक नहीं हो सकते हैं? क्या हम हिंदू, मुस्लिम, सिख, या इसाई धर्म को छोड़कर मानव धर्म नहीं चुन सकते। क्या हम गुलामियों में शिफ्ट न होकर “आज़ाद” नहीं हो सकते।

0 Comments:
Post a Comment
Subscribe to Post Comments [Atom]
<< Home