Saturday, October 27, 2018

बस पूछना मत कि तेरे लिए हम क्या छोड़ आए हैं।(कविता)



बस पूछना मत कि तेरे लिए हम क्या छोड़ आए हैं।(कविता)
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मना लो खुशीयां  
कि हम हरम छोड़ आये है
पर जब भी इबादत में उठते है हाथ मेरे
याद आता है कि हम घर छोड़ आये है,

ये सूरज की किरणे हमे इसलिए चुभती हैं
कि लखनऊ की शामो को 
हम ढलता छोड़ आये हैं
एक जनाब से हमने कहा 
कि अब हमने बागों में टहलना छोड़ दिया है
वो हैरत से तकते रहे मुझे और पूछ बैठे 
की संगम का वो किनारा छूट गया
या आप खुद ही छोड़ आये हैं,

एक पतली सी सड़क 
जो जाती है मेरे घर से बनारस की ओर
बस उसके किसी मोड़ पर 
हम जीने की हसरत छोड़ आये है,
मेरी खुदगर्ज़ी का ये जज़्बा आज भी मुझे रुलाता है 
कि हम खुद को तो लाये हैं पर माँ को छोड़ आये हैं

जरूरतों को पूरा करने की जिद में याद आया एक दिन 
हमे पीतल तो मिल गया 
पर हम सोना छोड़ आये है
तसल्ली का मरहम हमे कभी मिला ही नही 
की हम खुद के बटोरे कंचों को 
किसी बन्द बोतल में छोड़ आये है 
गुजरे दिनों की यादें हमे इसलिए भी रुलाती है 
कि आंखों में हम किसी को सँवरता छोड़ आये हैं,

ये चाँद मुझसे आखिर रुठा क्यो रहता है 
शायद हम किसी के चेहरे का उगता सूरज छोड़ आये है
अब तो हँसी आती है अपनी मक्कारी पर हमको
बनते खुशमिज़ाज पर हम खुशियां छोड़ आये हैं,
वो सड़क आज भी बुलाती है हमे
जिसकी एक मोड़ पर हम इश्क़ अपना अधूरा छोड़ आये हैं,

कौन माफी देगा मुझे मेरे इन गुनाहों की 
हम जिस्म तो लाये पर अपनी रूह छोड़ आये हैं
लोगो ने कहा मुझसे
कि मजा लो इस महफ़िल का
अब उनसे कैसे कहें हम ये
कि अपनी महफ़िल हम किसी और दिल मे छोड़ आये है
वो राते जो खामोश थी किसी श्मशान सी
उन रातो में हम किन्ही जुल्फों का आँचल छोड़ आए हैं

उनके इंतेज़ार में थक चुकी है ये आंखे अब 
की हम इनमे ही उनको बसता हुआ छोड़ आये है
हमे अपनी मौत से पहले
 ये गुज़ारिश करनी है 
कि किसी को मत बताना कि हम जीते जी क्या छोड़ आये हैं।
साभार- शैलेश मिश्रा/अभिषेक नंदन

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1 Comments:

At July 24, 2020 at 10:59 AM , Blogger Indian Open Minds said...

हम जो कुछ भी कहते या करते हैं उसमें हम एक स्थिति अपना रहे हैं। हम इसे पसंद करते हैं या नहीं, स्थिति राजनीतिक है । कारण, राजनीति का संबंध जीवन की हर चीज से है। हमें क्या शिक्षा लेनी है और क्या लेनी है या नहीं, हमें कौन सा काम मिलेगा और क्या मिलेगा या नहीं, हमें अपने खर्चों के लिए कितने पैसे देने होंगे और अपने और अपने परिवार के जीवन को चलाने के लिए कितना पैसा चाहिए। हम कितना पैसा कमा सकते हैं या कितना कमा सकते हैं और उससे मुझे कितना कर देना चाहिए और राज्य को करों के रूप में कितना देना चाहिए - ये सभी सवाल राजनीतिक सवाल हैं। क्या हमारी शिक्षा और जीवन के लिए तैयारी वैसी ही होनी चाहिए जैसी सभी के लिए है या हमारे अलावा कुछ अन्य लोगों को भी हमसे कम या ज्यादा अवसर हैं?

 

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