राष्ट्रगान पर मतभेद क्यों?
अभी 4 दिन पहले की बात है। मैं पटना गया हुआ था। दोस्त Amitav के साथ Jumanji देखने का प्लान बना। शहर के Cinepolis,PNM Mall,Patna में 4:30 बजे का शो मैंने बुक किया । लाइफ ऑफ पाई के बाद यह दूसरी फिल्म थी जिसे मैं 3D में देखने के लिए एक्साइटेड था।
थिएटर गया पहले तो ढेर सारी एडवर्टाइजमेंट दिखे। हम दोनों एक दूसरे से बात करने में मशगूल थे। अचानक से हॉल में अनाउंसमेंट हुई , कृपया राष्ट्रगान के लिए खड़े हो जाएं । पर हम इसके लिए बिल्कुल भी तैयार नहीं थे । हम विराट और अनुष्का की शादी की बात कर रहे थे शायद । पर फिर भी अनाउंसमेंट हुई और लोग अचानक से खड़े हो गए । हम भी खड़े हुए । क्योंकि राष्ट्रगान की धुन जैसे ही कानों में पड़ी अचानक खड़े होने वाली आदत है ।
पर यह राष्ट्रभक्ति कहीं से भी प्राकृतिक नहीं लग रही थी। बिल्कुल थोपी हुई और नकली राष्ट्र भक्ति प्रतीत हो रही थी। मैंने पुरे दिल से राष्ट्रगान तो गा दिया और उसके बाद मैंने कहा कि अब क्या भारत माता की जय और वंदे मातरम भी होगा । हम इंतजार ही कर रहे थे कि एक राष्ट्रभक्त ने उधर से भारत माता की जय के नारे भी लगा दिए। माहौल पूरा 15 अगस्त और 26 जनवरी वाला हो गया था।
यह सब काफी हास्यप्रद लग रहा था। बहुत हंसी आ रही थी। पर हद तो तब हो गई जब 10 मिनट बाद ही फिल्म में हॉट पैंट पहने Madison Iseman की एंट्री होती है, और 10 मिनट पहले राष्ट्रगान में खड़ा आदमी पीछे से आवाज़ लगाता है । देख माल आ गई।
यह दोनों ही चीजें बिल्कुल भी प्रासंगिक नहीं थी। एक दूसरे से दोनों का ही कोई संबंध नहीं था । पर मानसिकता की बात की जाए तो आप अंदाजा लगा सकते हैं कि लोग हॉल में क्यों जाते हैं । और राष्ट्रगान के क्या मायने हैं ।
इन दोनों के बाद सुप्रीम कोर्ट का फैसला अच्छा लग रहा है। हर किसी को अपने राष्ट्र का सम्मान, अपने राष्ट्र से प्रेम जरूर करना चाहिए। पर थोपी हुई किसी भी चीज के पक्ष में नहीं हूं मैं।
Gunjan ki KALAM se


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