Monday, October 30, 2017

आज़ादी???

सवाल जवाबो के इस दौर में,
देशद्रोह और भक्ति की भाग दौड़ में ,
थी क्या आजादी ,
ये ख्याल मन में आया है,
उमड़ते सवालों का एक जवाब मन में आया है।

मायूस आंखों की उम्मीद थी आजादी,
दबे-कुचलों की तकदीर थी आजादी,
कुछ तो तब भी आजाद थे,
आजाद अब भी हैं ,
जो रोटियों के मोहताज थे
उन की आखिरी लकीर थी आजादी ।

पर देखते-देखते पैमाना बदल गया ,
सरकारों के साथ जमाना बदल गया,
मायूस आंखों में अब भी मायूसी नजर आती है,
दबे-कुचलों की तकदीर में अब भी मनहूसियत नजर आती है,
जो आज़ाद थे वो आजाद अब भी हैं ,
जो रोटियों के मोहताज थे,
मोहताज अब भी हैं ।

जो हुकूमतों के बदलने से,
खुद को आजाद तुम समझते हो,
जो शहरों की चकाचौंध को ही,
भारत तुम समझते हो ,
होगे कहीं के नायक तुम,
पर मुझे तो बस नादान से तुम लगते हो,

जमीन के टुकड़े का आजाद होना ही अगर आजादी है ,
तो हम आजाद कहां हुए,
सिनेमा हॉल में राष्ट्रगान का गाया जाना ही अगर आजादी है,
तो हम आजाद कहां हुए ,
70 साल बाद भी भूखे सोते लोग ही अगर आजादी है ,
तो हम आजाद कहां हुए

अगर सच कहूं तो ,
एक बेहतर समाज के कल की मजबूत नींव थी आजादी ,
हारे हुए भारतीयों की सबसे बड़ी जीत थी आजादी ,
हारे हुए भारतीयों की सबसे बड़ी जीत थी आजादी।।

Gunjan ki KALAM se

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