Tuesday, November 28, 2017

फिल्मी कीड़ा :तमाशा



"जब तक इस देश में सनीमा है, लोग **** बनते रहेंगे।"

गैंग्स ऑफ वासेपुर का यह डायलॉग वर्तमान परिपाटी में बिल्कुल फिट बैठता है। मसाला फिल्मों के दौर में  जहां गोलमाल 4 ,ग्रैंड मस्ती और इस पंक्ति की फिल्में सफल मानी जाती हैं ।उस दौर में आप सिनेमा से ,समाज या व्यक्ति की अंतहीन कहानी दिखाने की अपेक्षा नही कर सकते । क्योंकि ये वो दौर है ,जहां सिनेमा सिर्फ और सिर्फ बिजनेस बन चुका है । और आप देखेंगे तो पाएंगे कि ऐसा कोई दौर नहीं बचा जिसमें समाज ने सिनेमा के हिसाब से अपनी करवट नही बदली ।

एक वक्त था जब सिनेमा को समाज की परछाई कहा जाता था। एक वक्त वह भी आया जब सिनेमा को समाज का अग्रसर कहा जाने लगा ।और एक दौर यह भी है जब सिनेमा समाज पर हावी हो चुका है।
घटनाक्रम के गहन अवलोकन से आप पाएंगे कि इस दौर में तमाशा, हाईवे,गैंग्स ऑफ वासेपुर, न्यूटन, रॉकस्टार इत्यादि। जैसी कई फिल्मों को बनाने के लिए कलेजा चाहिए। क्योंकि ये फिल्में आपको वह मुनाफा नहीं करा सकती ,जो मसाला फिल्में कराती है।

क्योंकि जो भाव, जो मेहनत और वह पतली सी लकीर जो बांटती है सिनेमा और जिंदगी को। उस लकीर को फिल्म में शामिल कर लेना, एक डायरेक्टर के लिए जितना कष्टदाई होता है,जितना मेहनती होता है । उतनी ही मेहनत इन फिल्मों को देखने, समझने और महसूस करने में लगती है ।

एक दर्शक के रूप में भी आपको फिल्म से उसी प्रकार जुड़ना पड़ता है । जिस प्रकार से एक निर्देशक या एक अभिनेता इन फिल्मों से जुड़ता है ।

तमाशा के 2 साल पूरे हो गए कल। ये वो फिल्म थी जिसमें मैं अपने आप को देख रहा था ।अपने आने वाले कल को देख रहा था। इस फिल्म ने मुझे यह सोचने की ताकत दी कि, हां मैं भी इतनी हिम्मत कर सकता हूं कि कल अपने सपने को जीने के लिए मैं उधार के सपनों को ताक पर रख सकूं । आज से 10 साल बाद भी मुझ में फैसले लेने की हिम्मत बची हो। मैं चूर न हो जाऊं 10:00 से 4:00 के बीच। मैं दब न जाऊं प्रमोशन और वेतन के बीच। ताकि ज़िंदा रह सके दिल के किसी कोने में घुसा हुआ वह बच्चा। ताकि जिंदा रख सकूं मैं खुद को । ताकि मैं रोबोट ना बन जाऊं। जिसे प्रीप्रोग्राम किया गया हो। जिसकी कार्य क्षमता सीमित है। ताकि मैं अनिश्चित हो जाऊं अनंत हो जाऊं ।

अगर आप तमाशा की टिकट लेकर एक फिल्म देखने गए होंगे, तो एक फिल्म के हिसाब से आपको इसने मायूस किया होगा। पर यह भी उतना ही सत्य है कि अगर आपने एक बार इस फिल्म से खुद को जोड़ लिया तो यह फिल्म आपको आपकी ज़िंदगी दिखाएगी। उस रूपहलर पर्दे पर किरदारों की जगह आप संघर्ष कर रहे होंगे।
यकीन कीजिये ये एक सुहाना सफर होगा।
अगर अबतक नही देखी तो जरूर देखिए।

#gunjan_ki_kalam_se

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