Sunday, November 19, 2017

विचारधारा की टुच्ची लड़ाई।

गाँधी, गोड्से एवं भगत सिंह।
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2016 में हुआ जे एन यू प्रकरण सभी को याद होगा। याकूब मेनन और अफजल गुरु की फांसी के खिलाफ कुछ लोग इकट्ठा हुए थे । प्रशासन द्वारा त्वरित कारवाई के बाद जब मामले ने तूल पकड़ा तब इसे राजनीतिक रंग दिया जाने लगा। अपने अपने स्वार्थ एवं लाभ के लिए विभिन्न राजनीतिक पार्टियों ने इस प्रकरण में छलांग लगाई । आयोजन एवं प्रदर्शन करने वालों पर देशद्रोह का मुकदमा दर्ज किया गया ।और यह जायज भी है ।भारतीय न्यायपालिका से सजा पर चुके या फांसी पा चुके अपराधियों के समर्थन में, की गई कोई भी टिप्पणी या आयोजन देशद्रोह के दायरे में आना ही चाहिए।
       
             इसी क्रम में मैं आप को थोड़ा पीछे ले जाते हुए स्वतंत्र भारत की पहली फांसी की याद दिलाना चाहूंगा। भारतीय न्यायपालिका द्वारा दी गई फांसी की पहली सजा। 'नाथूराम गोडसे' । उस वक्त जब फांसी हुई तब से लेकर अब तक ,एक विशेष विचारधारा के लोगों ने नाथूराम गोडसे का पक्ष लिया तथा समय-समय पर उससे संबंधित आयोजन भी करते आए हैं। हद तो तब हो गई जब नाथूराम गोडसे के मंदिर बनाने की भी चर्चा उठ गई।
       क्या फर्क रह गया है इस्लाम समर्थित याकूब मेनन और अफजल गुरु के समर्थकों में तथा हिंदू संगठन समर्थित नाथूराम गोडसे के समर्थकों में । स्थित यहां तक बन गई है कि गोडसे का समर्थक होना एक सच्चे हिंदू होने की आवश्यक शर्त है ।
उपरोक्त प्रश्न उठाने पर गोडसे समर्थकों की तरफ से जो पहला उत्तर आता है । वह है कि यह विचारधारा की लड़ाई है । मैं साफ-साफ बताना चाहूंगा कि हां यहां अलग अलग विचारधाराओं का सदैव स्वागत रहा है । स्वतंत्रता संग्राम में निश्चित तौर पर गांधी के विरोधी विचार वाले भी मौजूद थे । पर गांधी के विचारों की पूर्ति गोडसे के विचारों से हो यह हास्यप्रद है । भगत सिंह और गांधी के विचारों में भी सदैव विरोधाभास रहे हैं ।पर दोनों ने ही अपना अलग रास्ता चुना। गांधी का विरोध करने वाले गोडसे की जगह अगर एक बार भगत सिंह को पढ़ लें। तो विचार एवं आतंक का फर्क समझ जाएंगे ।
साथ ही साथ गोडसे का समर्थन उन दावों पर करारा तमाचा है ,जो हिंदुओं को सहिष्णु ,अहिंसक एवं न्याय प्रिय बताते हैं ।तथा हिंदुत्व को एक धर्म नहीं बल्कि जीवन जीने की कला।
         और ऐसा नहीं है कि गोडसे के समर्थक गोडसे के विचारों से प्रभावित होते हैं ।उनके लिए सिर्फ और सिर्फ एक ही आवश्यकता है ,और वह है गांधी का कट्टर विरोधी होना । यह बड़ा अजीब सा समर्थन है जहां लोग समर्थक नहीं बल्कि अंधभक्त बने पड़े हैं ।
          हां पर एक सच यह भी है कि किसी का समर्थक या विरोधी किसी और के कहने से नहीं बना जा सकता। लोग स्वतंत्र हैं इस चुनाव के लिए। पर समर्थक या विरोधी होने के लिए उस व्यक्ति के बारे में पढ़ा जाना भी उतना ही आवश्यक है ।
अतः तार्किक रूप से गहन अध्ययन के बाद ही अपना समर्थन या विरोध दर्ज कराएं।
Gunjan ki KALAM se

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