Sunday, January 7, 2018

सब ठीक जो जाएगा: कविता

सब ठीक हो जाएगा।(कविता)
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जब इमारते रंगीन हो रही हैं ,
और रिश्ते बेरंग हो रहे हैं,
जब अस्पतालों में किलकारियां ,
चीखों में तब्दील हो रही हैं,
जब हवा में खुशबू नहीं ,
डर फैल रहा है।
तब भी एक उम्मीद कायम है,
इंसान के इंसान बने रहने की,
उम्मीद कायम है ।
माघ की सर्दी में ,
रेलवे स्टेशनों के बगल की झुग्गियां ,
जब मन विचलित करती हैं।
झुग्गियों के अंदर दम तोड़ रही उम्मीदें,
जब मन विचलित करती हैं।
थाम लेता हूं बेचैन मन की डोर को,
क्योंकि यूं ही चुपचाप बैठा नहीं जाता।
हाथ पर हाथ धरे रहा नहीं जाता।
जी करता है काट लूं ,
दुनिया से खुद को ।
जला दूं अखबारों को,
बुझा दूं समाचारों को ।
उदास मन लेकर,
बैठ जाता हूं घर के इक कोने में।
फिर पापा को गाजर का हलवा बनाते देख ,
लगता है सब ठीक हो जाएगा।।।

Gunjan ki KALAM se

2 Comments:

At January 7, 2018 at 8:31 AM , Blogger Unknown said...

बेशक !सब ठीक हो जायेगा..

 
At January 10, 2018 at 11:03 PM , Blogger Unknown said...

बेशक !सब ठीक हो जायेगा..
गाजर का हलवा जरूर खाएंगे😊

 

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