Sunday, January 21, 2018

दहेज़ और बाल विवाह से निजात पाने के कारगर उपाय।


कल बिहार में बाल विवाह और दहेज प्रथा के उन्मूलन हेतु ,भव्य मानव श्रृंखला बनाने की कोशिश की गई थी। मुझे पता नहीं है कोशिश कितनी सफल या असफल हुई। क्योंकि मानव श्रृंखला को सफल या असफल मानने का कोई बराबर पैमाना नहीं था । जहां पक्ष के लोग इसे भारी सफल मान रहे है। वही विपक्ष के लोग इसे बिल्कुल ही असफल मान रहे हैं।
                   पर मुझे इन दोनों से ही कोई मतलब नहीं। क्योंकि सफलता या असफलता हमेशा धरातल पर दिखती है। जमीनी स्तर पर योजनाएं या फिर आपके संकल्प कितने सच साबित हुए सफलता या असफलता की गारंटी मानी जाती है ।
                कल का दिन मेरे लिए एक सामान्य दिनों की तरह ही था। मैं लाइन में लगकर दिखावे के संकल्प में भाग लेना नहीं चाहता था। और ना ही लाइन से बाहर आकर दहेज प्रथा और बाल विवाह को समर्थन देना चाहता था । हां एक खुशी जरूर हुई कि सरकार ने इस क्रम में एक सकारात्मक पहल की है। सामाजिक स्तर पर लोग बाल विवाह और दहेज प्रथा के बारे में बात करने लगे हैं। क्योंकि जिस प्रकार से सामाजिक बुराइयां सामाजिक मान्यताओं की जगह ले रही हैं, वो दिन दूर नहीं जब हत्या , अपहरण , रेप जैसी घटनाएं सामाजिक बुराइयों की जगह सामाजिक मान्यताओं का दर्जा प्राप्त कर लें।
              क्योंकि जब ये घटनाएं घटित होती है तो जिनके साथ ये होता है उनको छोड़कर अन्य किसी भी वर्ग पर इसका प्रभाव नहीं पड़ता।
                            कल भी मैं तटस्थ रहने की कोशिश कर रहा था । घर के पास की दुकान पर कुछ लोग खड़े थे। मैं भी वही बगल में खड़ा था। दुकान वाले भैया मेरे जान पहचान के थे। इसलिए उन्होंने कहा मानव श्रृंखला में सम्मिलित नहीं होंगे क्या? दुकान पर ही खड़े एक व्यक्ति ने दुकान वाले भैया से कहा- लगता है भाई जी दहेज लेकर ही शादी करेंगे। शायद उन्होंने एक व्यंग कसा था।  पर फिर भी मुझे इसका जवाब देना जरूरी लगा।
                        सबसे पहले मैंने उनका परिचय लिया। तो वह पास के ही किसी गांव के मध्य विद्यालय के मध्यान भोजन प्रभारी सह शिक्षक थे। मैंने उनसे कहा कि आपको क्या लगता है यहां जितने भी लोग हैं इस मानव श्रृंखला में वह कौन है ? उन्होंने जवाब दिया कि यह सारे लोग दहेज और बाल विवाह के खिलाफ संकल्पित होने के लिए क्या एकत्रित हुए हैं । मैंने कहा- नहीं ,मुझे ऐसा नहीं लगता । मुझे इसमें सिर्फ दो किस्म के लोग ही नजर आते हैं । पहले वो जिन्होंने दहेज लेकर ही विवाह किया है । और दूसरे वो दहेज़ क्या है? इसके बारे में कुछ पता ही नहीं है।
     
                   फिर मैंने उन्हें 1 साल पहले की बात याद दिलाते हुए उनसे पूछा कि आज से 1 साल पहले भी शराबबंदी के खिलाफ लोग यूं ही मानव श्रृंखला बनाकर एकत्रित हुए थे । मैं भी उसमें सम्मिलित हुआ था। मुझे आप बताइए कि उसके क्या फायदे हुए। उन्होंने बताया कि सरकार ने शराबबंदी के लिए एक बेहतर कानून लाया। जिससे लोगों में यह धारणा कायम हुई की शराब एक बुरी चीज है। जिसका सामाजिक स्तर पर बहिष्कार किया जाना चाहिए । तथा अब किसी की मजाल नहीं कि वह खुलेआम शराब पीकर घूम सके या फिर खुलेआम शराब खरीद सके । तो मैंने कहा की कुल मिलाकर आप यह कहना चाहते हैं कि नीतीश कुमार ने शराबबंदी कानून के तहत शराब जैसी सामाजिक बुराई को ढक दिया।
                तो उन्होंने भी हाँ में अपना सर हिलाया। तो मैंने कहा - पर दहेज तो सदियों सदियों से ढका हुआ ही है। कोई भी खुलकर दहेज नहीं लेता। बंद कमरे में दो लोगों के बीच दहेज की बातें होती है।
               फिर उन्होंने मुझसे सवाल किया । तो फिर आपके हिसाब से क्या कदम उठाए जाने चाहिए?
मेरे हिसाब से आने वाली भावी पीढ़ी या जो बच्चे विद्यालयों में पढ़ रहे है । उन्हें दहेज के नफे-नुकसान के बारे में पूरी जानकारी देनी चाहिए। उन्हें बताना चाहिए कि दहेज किस प्रकार समाज के लिए, परिवार के लिए घातक साबित होता है । उन्हें दहेज के कानूनों के बारे में पूरी जानकारी देनी चाहिए। क्योंकि जब तक हम स्वयं में किसी भी सामाजिक बुराई से लड़ने को तैयार नहीं हो जाते, सरकार की चेष्ठा नहीं होती कि वह हमसे उस सामाजिक बुराई को बंद करवा ले। क्योंकि हत्या, अपहरण, रेप जैसे कृत्यों पर कानून कब के बन चुके हैं। पर वह आज भी हो रहे हैं। लेकिन एक बड़ा वर्ग है ,जो यह मान चुका है अपने मन ही मन में ,की ये चीजें गलत है। ये चीजें नहीं करनी है । क्योंकि वह बड़ा वर्ग मानसिक रूप से तैयार है यह मानने के लिए कि क्या गलत है और क्या सही है । ठीक उसी प्रकार हमें आने वाली पीढ़ी को भी मानसिक रूप से तैयार करना होगा दहेज के खिलाफ भी।
 
        यह तो रही आने वाली पीढ़ी की बातें। वर्तमान के माता पिताओं को भी खुद में यह संकल्प लेना होगा कि किसी भी लड़की के विवाह में वह दहेज नहीं देंगे। और यह संकल्प हर लड़की के पिता को लेना ही होगा ।क्योंकि इस चक्र में अगर एक भी जगह किसी ने दहेज दिया जाता है , तो यह चक्र टूट जाएगा । क्योंकि अगर एक आदमी दहेज के लालच में तीन जगह अपनी शादियां तोड़ चुका और चौथे , पांचवें और छठे जगह भी एक लड़की का पिता दहेज़ देने से मना कर देता है । तो लड़के की मजबूरी हो जाएगी बिना दहेज के विवाह करने की। क्योंकि अगर ऐसा नहीं किया उसने तो वह कुंवारा रह जायेगा।
          ऊपर की दोनों बातें सामाजिक स्तर पर थी। पर प्रशासनिक या कानूनी रूप से कहा जाए तो सरकार इसके लिए बकायदा एक सख्त कानून तैयार करें। और हर विवाह के बाद बारातियों के साथ जा रही ट्रक ,टैक्सी और पिकअप को चेक किया जाए । मुझे लगता है इन उपायों से दहेज पर काबू पाया जा सकता है ।
               बाल विवाह के लिए परिवारों को शिक्षित करना अति आवश्यक है। बहुत बड़े स्तर पर नहीं तो कम से कम उन्हें यह बताना आवश्यक है कि कम उम्र में विवाह करने पर एक लड़की को किस प्रकार की कठिन परिस्थितियों का सामना करना पड़ता है । शारीरिक समस्याओं का सामना करना पड़ता है । क्योंकि बाल विवाह के केस में ज्यादा परेशानियां चुकी लड़कियों को ही होती है । इसलिए लड़कियों के मां-बाप को आंगनवाड़ी ,सेविका ,आशा तथा प्राथमिक स्तर पर जो भी सरकारी संस्थाएं कार्यरत हैं उन्हें आगे बढ़कर अपने गांव अपने वार्ड में यह जागरुकता फैलाने होगी ।
इस तरह से मुझे लगता है की दहेज़ और बाल विवाह से निजात पाने का एक उपाय यह साबित हो सकता है।
Gunjan ki KALAM se

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