गुंजन की कलम, स्याही तुम्हारी
अचानक से कभी बैठे बैठे यूं ही मन डर सा जाता है । बहुत ज्यादा डर जाता है। इस डर का कारण क्या होता है यह तो पता नहीं चलता । पर कभी गौर करने पर सोचता हूं, कि क्या यह डर उस गति से है जिस गति से समय भाग रहा है । या फिर उस चकाचौंध से ,जिस से मैं भागा फिर रहा हूं ।या फिर उन शब्दों से जिनकी सहायता से मैं कुछ भी लिख देता हूं। कि कहीं खत्म न हो जाए , समय ,उम्र और शब्द ।
कभी-कभी लगता है कुछ बचा ही नहीं है लिखने को । सब कुछ लिख दिया मैंने, जो कुछ मेरे भीतर था। इस सीमित संसाधनों वाले विश्व में ,कहां से मैं अपने शब्दों में असीमितता लाऊंगा। निराश हो जाता हूं अक्सर आगे की जिंदगी देखकर उस 10:00 से 4:00 की नौकरी देख कर ।क्योंकि एक लिखना ही तो है जिसे मैं नौकरी नहीं समझता। यह एक रोमांच है। एक अलग ही दुनिया है यह मेरी। दुनिया ,जहां की एक एक इमारत मैं खड़ी करता हूं ।यहां के एक एक किरदार मेरी जागीर है। इस दुनिया में घटी हर घटना की जिम्मेवारी मेरी होती है । और जो कल यह दुनिया यह लिखना भी मेरे साथ ना रहा तो मैं क्या करूंगा । इस भीड़ में क्या कहीं गुम हो जाऊंगा ।
निराश नजरों की नजर तुम्हारी दी हुई डायरी पर रुक जाती है ।डायरी में बस तुम हो। डायरी के हर पन्नों के बीच , पन्नों की हर लाइनों के बीच, लाइनों के हर शब्दों के बीच, शब्दों के अर्थों के बीच, अर्थों के हर एहसासों के बीच , एहसासों की हर आहों के बीच।
इकलौती तुम ही नजर आती हो । जिस पर कभी कुछ लिखा ही नहीं गया। क्योंकि शायद तुम्हें उस क़दर कभी पढ़ा ही नहीं गया। क्योंकि मुझसे बेहतर और मुझसे ज्यादा करीब से किसी ने देखा ही नहीं तुम्हें । तुम्हारी हर ढलान से हर ठहराव तक, तुम्हें कोई मुझसे बेहतर नहीं जान सका । क्योंकि तुम्हें ढलते बदलते देखा है मैंने। कागज़ पर उतार दी जाने वाली तुम्हारी हर चीज से मैं रूबरू हूं ।
तुम से बेहतर कुछ नहीं है लिखने को। उम्र निकल जाएगी पन्ने भरते भरते।बस उस एक पंक्ति की तलाश में जो उन पन्नों , किताबों को पूरा कर दें।
और क्या चाहिए एक लेखक को , अगर उसे लिखने को ताउम्र का एक काम मिल जाए । जिसमें वह जिए और लिखते हुए ही वह मर जाए।
कभी-कभी लगता है कुछ बचा ही नहीं है लिखने को । सब कुछ लिख दिया मैंने, जो कुछ मेरे भीतर था। इस सीमित संसाधनों वाले विश्व में ,कहां से मैं अपने शब्दों में असीमितता लाऊंगा। निराश हो जाता हूं अक्सर आगे की जिंदगी देखकर उस 10:00 से 4:00 की नौकरी देख कर ।क्योंकि एक लिखना ही तो है जिसे मैं नौकरी नहीं समझता। यह एक रोमांच है। एक अलग ही दुनिया है यह मेरी। दुनिया ,जहां की एक एक इमारत मैं खड़ी करता हूं ।यहां के एक एक किरदार मेरी जागीर है। इस दुनिया में घटी हर घटना की जिम्मेवारी मेरी होती है । और जो कल यह दुनिया यह लिखना भी मेरे साथ ना रहा तो मैं क्या करूंगा । इस भीड़ में क्या कहीं गुम हो जाऊंगा ।
निराश नजरों की नजर तुम्हारी दी हुई डायरी पर रुक जाती है ।डायरी में बस तुम हो। डायरी के हर पन्नों के बीच , पन्नों की हर लाइनों के बीच, लाइनों के हर शब्दों के बीच, शब्दों के अर्थों के बीच, अर्थों के हर एहसासों के बीच , एहसासों की हर आहों के बीच।
इकलौती तुम ही नजर आती हो । जिस पर कभी कुछ लिखा ही नहीं गया। क्योंकि शायद तुम्हें उस क़दर कभी पढ़ा ही नहीं गया। क्योंकि मुझसे बेहतर और मुझसे ज्यादा करीब से किसी ने देखा ही नहीं तुम्हें । तुम्हारी हर ढलान से हर ठहराव तक, तुम्हें कोई मुझसे बेहतर नहीं जान सका । क्योंकि तुम्हें ढलते बदलते देखा है मैंने। कागज़ पर उतार दी जाने वाली तुम्हारी हर चीज से मैं रूबरू हूं ।
तुम से बेहतर कुछ नहीं है लिखने को। उम्र निकल जाएगी पन्ने भरते भरते।बस उस एक पंक्ति की तलाश में जो उन पन्नों , किताबों को पूरा कर दें।
और क्या चाहिए एक लेखक को , अगर उसे लिखने को ताउम्र का एक काम मिल जाए । जिसमें वह जिए और लिखते हुए ही वह मर जाए।

