Sunday, February 26, 2017

इतना बड़ा चॉकलेट , खाने में मज़ेदार, दू रुपिया में खरदा, तीन रुपिया में बेचा।

"इतना बड़ा चॉकलेट ,खाने में मजेदार दू रुपिया में खरदा, तीन रुपिया में बेचा" 
अगर आपको ऊपर लिखी पहेली का अर्थ समझ नहीं आया, तो निश्चित ही आप अपने बचपन के होनहारों में  से नहीं थे। पर सुमित को इसका अर्थ मालूम था, रितु और उसकी सहेलियों ने सुमित से यह पहेली की थी पांचवी कक्षा में। उस वक्त सुमित भी फसा था। सबने उसका मजाक उड़ाया था। पर अब छठवीं में आते-आते सुमित सैकड़ों लड़कों से यह पहली पूछ कर, उनका मजाक बना चुका था।
Tution, exam, school और लड़ाइयों में 3 साल बीत गए । 9वीं के आखिरी तिमाही exam  के बाद सुमित ने ऋतु को प्रपोज कर दिया। एग्जाम की छुट्टियों के बाद स्कूल में बस एक ही चर्चा थी । सुमित और ऋतु के बीच कुछ है। ये जो 'कुछ' था न उन दोनों के बीच , सुमित इसे ही प्यार समझता था। दसवीं के अंत तक दोनों स्कूल के स्टार कपल बन चुके थे ।बिल्कुल परफेक्ट वाले। घर से स्कूल साथ,स्कूल में साथ, स्कूल से घर साथ, फिर ट्यूशन भी साथ। और अगर आप इतना ज्यादा साथ रहते हैं  माने आपके बीच प्यार है।
 'कोटा, राजस्थान'।
 दसवीं की परीक्षा  में सुमित और रितु दोनों को अच्छे नंबर आए। इस कारण दोनों को इंजीनियरिंग की तैयारी के लिए, कोटा की एक मैन्युफैक्चरिंग फैक्ट्री में भेजा गया। जहां इंजीनियर्स मैन्युफैक्चर होते थे ।।                      कोटा में दोनों का प्यार अपने अगले लेवल पर गया। दोनों के बीच की नजदीकियां बढी। सुमित इसे भी प्यार के उस अनिवार्य प्रारूप का एक चरण मानता था, जो उसने आज तक देखा था । इलेवंथ में क्योंकि दोनों पहली बार घर के बाहर अकेले थे ,इस कारण कभी-कभार दोनों का एक दूसरे के रूम पर रुक जाना अब आम बात हो गई थी ।
 इस घुमा फिरी में इलेवेंथ की पढ़ाई तो बिल्कुल चौपट हो चुकी थी। इसलिए बारहवीं में दोनों ने जेईई पर फोकस करने का मन बनाया । सारे टेस्ट्स डीपीपी सॉल्व किए, एलेवेंथ के मेन चैप्टर्स की क्लासेस फिर से किए। पर संडे को दोनों हमेशा ही मिलते थे। कोचिंग में भी सब इन्हें परफेक्ट कपल मानते थे ।सुमित इस बात से काफी खुश होता था।
 'हंसराज कॉलेज ,दिल्ली '।
कोटा में 2 साल की तैयारी के बाद , अप्रैल 2014 में जेईई के इंट्रेंस एग्जाम थे। एग्जाम रिजल्ट्स आए, रितु ने अच्छा स्कोर किया। पर सुमित से ना हो सका। पर सुमित इससे उदास नहीं था। बोर्ड रिजल्ट और डीयू इंट्रेंस के दम पर ,उसने डीयू के हंसराज कॉलेज में एडमिशन लिया। वही रितु एनआईटी इलाहाबाद में गई।
'एक साल बाद '
सब कुछ नॉर्मल चल रहा था। पर सिर्फ तब तक, जब तक सुमित ने अपनी पुरानी डायरी   नहीं खोली थी ।डायरी में कुछ तस्वीरें थी ,कुछ जोक्स थे, फिर सबकुछ ऋतु के बारे में था । वो सब जो सुमित ऋतु के लिए सोचता था, लिखता था। पूरी रात उस डायरी को पढ़ने के बाद ,सुबह सुमित वहां आकर अटका , जहां अमूमन टुच्चे वाले आशिक ही पहुंचते हैं । मतलब बताता हूं । एक आशिक होते हैं, जो अपनी दाल गलाने में लगे होते हैं ,महबूबा किसी तरह मान जाए वो वाले । दूसरे होते हैं, वो जो रिलेशन में तो है , पर सिर्फ लड़ने के लिए । हर तीसरी बात पर झगड़ा ।और तीसरे वाले होते हैं वो , जिनकी लाइफ में सब पर्फेक्ट होता है। ना झगड़ा , न झंझट । यह जो सारी फिलोसफी है ना । इसे सोचने का ठेका, इन तीसरे वालों को हीं दिया गया है।सुमित भी इसी तीसरे टाइप में था।
एक कॉपी के सादे पेज पर , सुमित ने बोल्ड में 'प्यार' लिखा, और उसे अंडरलाइन कर दिया । थोड़ी देर ऐसे ही इस शब्द को देखते देखते । उसने फिर कलम उठाया, और प्यार के बगल में प्रश्नवाचक चिन्ह लगा दिया । '?' यह वाला ।
आंखें बंद करके वह सोचने लगा, कि यह प्यार क्या है? इसकी परिभाषा क्या है? कितने भेद हैं इसके? इसकी खोज में वह पहुंच गया 9वी के आखिरी तिमाही exam में । 
"मैंने रितु को प्रपोज किया ,उसने हां कहा"
 "ये हाँ ही प्यार था क्या?"
 "नहीं ये तो उसकी हामी थी, की हां वोभी मुझसे प्यार करती है" 
"तो क्या अगर मैं प्रपोज नहीं करता, तो प्यार नहीं होता"
"प्रपोज किया तो प्यार हुआ, प्रपोज नहीं किया तो नहीं हुआ "
ये कैसा लोचा है ?
फिर सोचते सोचते वो कोटा पहुंच गया।
"तब जब उसने ऋतु को पहली बार किस किया था, उसके करीब आया था" 
"क्या वो प्यार था?"
"नहीं, वो तो सेक्स था।"
"क्या सेक्स ही प्यार है?"
"नहीं नहीं, ये तो आसानी से जीबी रोड पर हजारों में मिल जाता है।"
यह इतना आसान नहीं हो सकता। यह प्यार नहीं हो सकता । ये तो शरीर की जरूरत है।
 और क्या है हमारे बीच जिसे प्यार कहा जाए?
"कुछ नहीं"
 अब सुमित परेशान हो चुका था।
वह उस चिड़िया को खोज रहा था, जिसे सब प्यार कहते थे । और वह भी।
 पर असल में सुमित, इन परेशानियों से परेशान नहीं था, बल्कि वो इसलिए परेशान था। क्योंकि इन सारी परेशानियों से वो अकेला परेशान हो रहा था।
ऋतु इस बारे में कुछ नहीं जानती थी। तो इसलिए सुमित अब यही सवाल ऋतु से करना चाहता था ।फेस टू फेस ।
अगले महीने की 13 तारीख को ऋतु का बर्थडे था ।अभी 22 दिन बाकी थे उसके बर्थडे में । सुमित अभी के अभी निकलना चाहता था इलाहाबाद के लिए। पर फिर सोचा की बर्थडे में जाना ही है तो उसी टाइम पूछ लूंगा। किसी तरह 20 दिन काटने के बाद अब सुमित से रहा नहीं जा रहा था। 12 नवंबर को ही वो ऋतु को बिना बताए, इलाहाबाद पहुंच गया। अपने एक दोस्त के रूम पर वह रुका था।
 अगले दिन की सेलिब्रेशन, रितु ने अपनी एक दोस्त  साक्षी के रूम पर रखा था। जो बाहर रुम लेकर रहती थी ।सुमित ने अपनी तरफ से भी तैयारियां की थी अगले दिन शाम को 7:00 बजे सुमित केक और एक ग्रीटिंग कार्ड लेकर पहुंचा।  दरअसल वह एक सरप्राइज पार्टी प्लान कर रहा था।
" रितु की फ्रेंड, साक्षी का रूम"
 सीढ़ियां चढ़ते हुए मैंने अपने फोन के फ्लैश लाइट को ऑन किया । काफी अंधेरा था वहां। मैंने दरवाजा खटखटाया ।
"साक्षी",मैं सुमित दरवाजा तो खोलो।
साक्षी ने दरवाजा खोला । पर जैसे ही मैं रूम के अंदर आया। I was shocked.
 वहां 5 लोग और थे। दो लड़के और तीन लड़कियां ।जिन्हें मैं नहीं जानता था ।उनकी बातों से लग रहा था कि वो, ऋतु को अच्छे से जानते हैं। मैंने चुपके से साक्षी से पूछा कि ये लोग कौन है ? 
उसने बताया कि ये ऋतु के फ्रेंड हैं, एनआईटी से ही हैं।
 मेरी उम्मीद से परे, रूम बिल्कुल सज चुका था ।
थोड़ी ही देर में रितु आई।
 अंदर आते ही उसने मुझे देखा। और एक दम से चीख पड़ी।
" woow, सुमित तुम यहां!!!"
"thanx 4 the surprise my love"
 उसने मुझे hug किया। मैंने भी किया। पर मेरी पकड़ उस ques के बाद पहले सी नहीं रही। पर मैं ऐसा कुछ रितु को फील नहीं होने देना चाहता था।
 सब बैठकर थोड़ी बहुत बातें कर रहे थे। मैं अकेला था।
 मैंने अपने फोन से रितु को एक मैसेज किया।
me: "luking awsm"
ritu:"thanx jaan, n thanx for giving me the         best gift, as u came here, luv u"
me: "anything 4 u sweety,luv u2"
me: "I have to talk to u any something,              meet me after the party"
ritu: "ok dear"
 कुछ ही देर में साक्षी ने सब को बुलाया , और केक काटने की तैयारी शुरू की । मैंने जो केक ऋतु के लिए लाया था वो उस केक का आधा भी नहीं था । मैंने अपना केक नहीं निकाला।
 पार्टी शुरु हुई । केक, स्नैक्स के बीच दो बोतलें बियर की भी थी। लड़कियों ने बिल्कुल थोड़ी सी ली । बाकी सारे लड़के गटक गए । फिर शुरू हुआ डांस। सब डांस कर रहे थे। पर मेरा मूड नहीं था । और मुझे डांस पसंद भी नहीं था। मैं बैठा बैठा सब का डांस देख रहा था।
 "अगली सुबह"
 मैं अपने दोस्त के रूम पर था। और रितु की कॉल का इंतजार कर रहा था । करीब 8:00 बजे रितु ने फोन किया । 
मैं :- हां हेलो ।
ऋतु:- good morning jaan, तुम चले क्यों गए थे             रात को इतनी जल्दी?
 मैं:-  ऐसे ही । कहां हो तुम?
 ऋतु :- साक्षी के रूम पर। कल रात डांस के बाद सारे         बहुत थक गए, तो यहीं रुक गए थे।
मैं:-  क्या ? तुम लोग सब वही हो । और वो आदित्य           भी?
ऋतु :- हां । क्यों क्या हुआ?
 मैं:-  मुझे मिलना है ।
रितु :- ओके मैं रेडी हो कर पार्क आती हूं, 1 घंटे में।
 मैं:-  ओके बाय ।
"पार्क, 9:30 बजे सुबह"
 हम दोनों पार्क में घास पर ही बैठे हुए थे।
 रितु ने पूछा :- कल तुम अचानक पार्टी से वापस क्यों                      आ गए। 
 मैं :- क्योंकि मुझे आदित्य का ऐसे तुम्हारे साथ डांस             करना अच्छा नहीं लग रहा था।
 रितु :- ohho, जलन , possessive । ,चलो मेरी भी          ख्वाहिश पूरी हुई। बहुत स्पेशल फील होता है              जान ,जब तुम ऐसे रिएक्ट करते हो ।
 मैं:-  मैं मजाक नहीं कर रहा हूं । मुझे गुस्सा आ रहा             था ।
ऋतु :- अरे बस फ्रेंड है यार।
 मैं :- ये कैसा फ्रेंड है जो रात में रुम पर भी रुक जाता           है । मेरे सामने यह सब हो रहा है , तो पता नहीं            मेरे पीठ पीछे क्या सब होता होगा  
रितु गुस्से में :- क्या मतलब है तुम्हारा? क्या बोलना                           चाहते हो तुम? देखो सुमित , मेरी                               पर्सनल लाइफ बिल्कुल तुम्हारे साथ है।                       एक बहुत बड़ा हिस्सा हो तुम मेरी                             पर्सनल लाइफ का । पर मेरी सोशल                           लाइफ में मुझे क्या करना है। क्या नहीं।                     ये मुझे किसी से पूछने की जरुरत नहीं                       है ।मैं बस तुम से प्यार करती थी ,करती                     हूं ,और करती रहूंगी ।पता नहीं तुम्हें                           क्या हो गया है। जो ऐसे ख्याल तुम्हारे                         मन में  आ रहे हैं।
 मैं:-  कुछ नहीं हुआ है मुझे। बस ये  दूरियां रिश्तो पर          भारी पड़ रही हैं। 
रितु:-  ऐसा कुछ नहीं है सुमित ।
मैं:-  एक सवाल था। पूछूं? 
ऋतु :- हां पूछो।
मैं:-  हमारे बीच ऐसा क्या है , जिसे मैं प्यार समझूं ?ऋतु :- ये कैसा सवाल है?
मैं:-  पता नहीं बस मेरे मन में था। तो पूछ लिया।
" थोड़ी देर की खामोशी के बाद "
मैं:- कोई जवाब नहीं है ना । मुझे इसी की उम्मीद थी ।
मैं वापस दिल्ली आ गया।  पर अब सब कुछ वैसा नहीं था जैसा मैं छोड़ कर गया था। धीरे-धीरे बातें कम हुई, फिर फोन सेक्स खत्म हुआ , फिर नाइट चैट्स और फिर कॉल के दरमियान शब्द खत्म हो गए। बातों में शब्द नहीं खामोशियों ने डेरा डाल दिया था। दूरियां इतनी बढ़ गई थी कि कॉल नहीं करना ही अंतिम उपाय था ।बातें बंद हो गई। 6 महीने यूं ही बीत गए। दिल्ली वैसी ही रही, मैं बदल गया।
 ऋतु की कमी ने ,मुझे उसकी मौजूदगी की अहमियत का अंदाजा दिलाया । जो जवाब मैं रितु से चाह रहा था। असल में वो जवाब मुझे खुद से मिला।
 "प्यार क्या है ?" 
"ये वो है जो उस शक का कारण था , जब मैंने रितु और आदित्य के बारे में उससे पूछा था ।"
"प्यार वो है जो ऋतु के सिवाय किसी और के बारे में मुझे सोचने नहीं देता"
" प्यार वो है जो हर शाम रात मुझे ऋतु की याद दिलाता है"
" प्यार तो उस भूख की तरह है जो बस लगती है , परिभाषित नहीं होती"
 मैं अब भी ऋतु से प्यार करता था। मुझे अब कोई जवाब नहीं चाहिए था । बस ऋतु चाहिए थी।
 मैंने रितु का नंबर लगाया। पर शायद उसने अपना नंबर बदल लिया था । मैंने साक्षी को फोन लगाया।
 मैं:- हां साक्षी मैं सुमित बोल रहा हूं साक्षी हां बोलो।
 मैं :- यार रितु से बात करनी थी । उसका नंबर ऑफ          आ रहा है ।कोई नया नंबर है तो दो।
साक्षी:-  सॉरी। मैं तुम्हें उसका नंबर नहीं दे सकती हूं।               और वैसे भी तुम अब उससे बात करके                        करोगे क्या? अब वह आदित्य के साथ                        रिलेशन में है ।
'मैंने फोन रख दिया। और फिर वापस कभी रितु से बात करने की कोशिश नहीं की। मैंने अपना प्यार खोया था ।वो  प्यार जिसने मुझे जवाँ होते देखा था। जिसके साथ मैंने अपने अच्छे और बुरे टाइम स्पेंट किए थे। पर अब कुछ भी मेरे हाथ में नहीं था।'
 "नवंबर 2016" 2 साल बाद।
एक दिन बस यूं ही facebook चलाते वक्त पता नहीं मुझे क्या सूझा। मैंने आदित्य सिन्हा की प्रोफाइल सर्च की । असल में मैं ऋतु की फोटो देखना चाहता था ।मैंने सारी फोटोस देखी पर ऋतु की एक भी फोटो नहीं थी। फिर मैंने about में जाकर आदित्य की info check की।
 एक बार फिर से मेरे होठों पर हंसी थी । पर खुशी वाली नहीं, बल्कि हताशा वाली। मैं खुद पर हंस रहा था । 
आदित्य किसी कृतिका नाम की लड़की के साथ कमिटेड था। मैं सारा माजरा समझ गया।
 साक्षी ने मुझसे झूठ कहा था, की ऋतु आदित्य के साथ है ।
 पर मैं अब कुछ नहीं कर सकता था। 2 साल बीत गए। शायद अब तक मैं और ऋतु अजनबी बन चुके थे।
 मैंने उसी डायरी के उस पेज को निकाला जिस पर मैंने "प्यार" लिखकर अंडरलाइन किया था।
मैंने "प्यार" को काटा ।और उसके जगह नया शीर्षक लिखा।
 "इतना बड़ा चॉकलेट, खाने में मजेदार , दू रुपिया में खरदा, तीन रुपिया में बेचा।" (LOVE)

निन्नी: तुम बच्ची ही ठीक थी।

"निन्नी""

College canteen,सुबह के 9 बजे

'रहीम चाचा तीन चाय और छह समोसे भिजवाना', यह कहते हुए साकेत ने बगल वाले टेबल से कुर्सी खींची।

 हम तीन लोग थे वहां ,मैं यानी कि राहुल, मेरा दोस्त साकेत और दिशा, हमारी कॉलेज की दोस्त ।यह सुबह भी हर रोज की तरह ही थी, जो कैंटीन से शुरू होकर कॉलेज क्लास होते हुए ढाबे पर खत्म होती ।पर मेरे लिए यह सुबह कोई और ही खबर लाई थी ।मैं उदास था और यह उदासी मेरे दोस्तों को मेरे चेहरे से साफ झलक रही थी ।

छोटू ने समोसे ला कर हमारे टेबल  पर रख दिया ।

'क्या बात है राहुल ,तू उदास क्यों है ।तू बिल्कुल भी सही नहीं लगता ऐसे'- दिशा ने कहा।

मैं चुप रहा।

 'क्या हुआ बे ,मैडम से झगड़ा हुआ क्या?' -साकेत ने मुझे चिढ़ाते हुए कहा ।

मैं फिर भी चुप था ।अब वह दोनों ही समझ चुके थे कि मैटर सीरियस है।

 'क्या हुआ है राहुल'- साकेत ने धीरे से मुझसे पूछा।

 मैं खुद को रोक न सका और अपने हाथों से अपना चेहरा ढकते हुए रो पड़ा । दोनों ने अपनी कुर्सियां मेरे करीब लाकर मुझे समझाया ,चुप कराया और फिर पूछने लगे कि क्या बात है, जो मैं यू रो रहा हूं। 

दोनों अपने अपने हिसाब से अंदाजा लगा रहे थे कि आखिर बात क्या है। 

दोनों की बेचैनी को देखते हुए मैंने पूछा- 'क्या लड़कियां आजाद हो चुकी हैं?'

साकेत- अब ये सवाल कहां से आ गया?

दिशा- यह तो डिपेंड करता है कि तुम्हारी आजादी के मायने क्या है ,परिभाषा क्या है ।खैर प्लीज तुम ये घुमा फिरा कर मत बोलो यार ,सीधे बताओ आखिर बात क्या है ?

मैं बचपन से एक लड़की को जानता हूं ।"निन्नी" ,बड़ा अजीब सा नाम है ना। मैं जब 10th में था तब तक  तो मैंने उसे देखा ।फिर मैं बाहर चला गया पढ़ाई करने ।साल भर बाद छुट्टियों में घर आया तो पता चला उसकी शादी हो गई है ।वह 16 की होगी उस वक्त, 12 वीं के एग्जाम देने घर आया तो पता चला बेटी हुई है उसे। मैं मिलने भी गया था, 1 kitkit वाला झूमर लेकर । वो बहुत खुश लग रही थी ।साल भर बाद मैं डीयू में था और वह एक बार फिर से पेट से थी पर अब काफी  दबाव था । लड़का पैदा करने का दबाव ।दवाब तो मुझ पर भी था। सेमेस्टर पास करने का दवाब।वक़्त बीता और मैंने सेमेस्टर पास कर लिया , पर निन्नी फेल हो गई । उम्मीदों पर पानी फेरते हुए एक बार फिर निन्नी को लड़की हुई ।साल भर पहले वाला सास का प्यार अब कड़वाहट  में बदल गया । ननद का लाड़ अब दुत्कार में बदल गया।रोज़ रोज़ की किच-किच से तंग आकर उसका पति उसे लेकर दिल्ली चला गया। जहां वो किसी फैक्ट्री में काम करता था । 

निन्नी ने उम्मीद की थी , कि वक्त के साथ चीजें साधारण होने लगेगी। सब कुछ पहले जैसा हो जाएगा। पर चीजें बद से बदतर होने लगी थी। उसका पति रोज रात शराब पीकर उसे पीटता था । पर निन्नी उन जंजीरों में बंधी थी ,जो समाज ने हर औरत के लिए नियम के रूप में बनाए हैं ।वो जानती थी कि अगर उसके पति ने उसे छोड़ दिया ,तो वो और उसकी बेटियां समाज की हवस का शिकार हो जाएंगी। कोई फर्क नहीं पड़ता की लड़की 4 की है 14 की या 24 की, समाज जब अपना नकाब हटाता है तो सबको लील लेता है ।

इस डर से वह रोज मार खाती थी ,कभी बेल्ट से कभी डंडे से । निन्नी की सास ने अपने बेटे को यह कह दिया कि वह वहां काम नहीं कर पाएगा , निन्नी के साथ रहकर, इसलिए निन्नी को यहां गांव पर छोड़ दें ।आज्ञाकारी पुत्र की तरह निन्नी के पति ने ,अगले ही महीने निन्नी को गांव लाकर मां के हाथों में सौंप दिया और खुद वापस दिल्ली चला गया। 

इधर 1 महीने साथ रहने के बाद निन्नी की सास ने अपना रंग दिखाना शुरू कर दिया। और निन्नी को घर से निकाल दिया ।उसकी सास अब एक पल भी नीनी को इस घर में बर्दाश्त नहीं कर सकती थी उसे पोता चाहिए था जो उसे तृप्त कर सके ।उसके वंश को आगे बढ़ा सकें ।

घर से 7 किलोमीटर दूर खेत वाली जमीन के पास ही निन्नी के ससुराल वालों की एक झोपड़ी थी जिसमें अनाज रखा जाता था अब निन्नी को वहीं रहने की आज्ञा मिली थी ।

करीब 20 25 रोज़ वहां रहने के बाद एक दिन अचानक नीनी के पेट में फिर दर्द हुआ ,पास के वैध ने बताया कि वह मां बनने वाली है ।पर निन्नी खुश नहीं थी फिर भी वह अपनी सास से मिलने गई और बताया कि उसके पैसे खत्म हो गए कुल मिलाकर उसके पास ₹2000 थे, जो जरुरत के सामान , किरासन तेल और बच्चों के दूध में खत्म हो गए। उसकी सास ने साफ साफ कह दिया कि वह महीने में उसे 1500 रुपए देगी जिसमें उसे अपनी और अपनी बेटियों की जरूरतें पूरी करनी हैं । निन्नी के पास इस प्रस्ताव को मानने के अलावा कोई और चारा नहीं था।

 पति उसे पैसे नहीं देता था ।सास ने उसका जीना हराम कर दिया था ।मायके में मरे बाप ने एक कमरा और 2 कट्ठा जमीन छोड़ रखा था ।जिस जमीन को लेकर निन्नी के चारों भाई अक्सर झगड़ा करते थे । तो आखिर वह करती भी क्या । जिस औरत के पति ने , ससुराल वालों ने ,साथ ही साथ मायके वालों ने भी हाथ खड़े कर दिए हो ,वह लड़की कर ही क्या सकती है।

 दरअसल समाज ने लड़कियों की बनावट ही इस प्रकार की है की वो हमेशा किसी न किसी पर आश्रित रहे। शादी से पहले पिता और भाई पर, शादी के बाद पति पर, और बुढ़ापे में बेटे पर, समाज ने कभी आजाद होने ही नहीं दिया इन्हें। 1500 रुपए लेकर निन्नी घर आई और हिसाब लगाया तो पता लगा 50 रुपय हर रोज की सीमा है । अगर किसी दिन ज्यादा खर्च किया तो अगला दिन मुश्किल होगा । निन्नी के पति को गए दो महीना हुआ था ,और उसके पेट में 3 महीने का बच्चा था ।अब उसे समझ नहीं आ रहा था कि वह 50 रुपए में बच्चों के लिए दूध लाएं या घर के खर्च के लिए जरूरी सामान, या उस बच्चे के लिए जो इस दुनिया में नहीं आया है उसके लिए दवाई । कभी-कभार किसी के यहां वह गेहूं साफ कर देती। तो कभी किसी के यहां बर्तन साफ कर देती इस तरह उसने अपना गुजारा करना सीख लिया। 

अब निन्नी छठे महीने में थी इस कारण से उसका पेट फूलने लगा था। उसे डर था कि अगर वह इस हालत में पैसे लेने गई तो उसकी सास समझ जाएगी कि वो पेट से है। इसलिए उसने अपनी बड़ी बेटी को पैसे लाने भेजा । 

सातवें महीने में निन्नी कहीं भी काम पर नहीं जा पाती थी। दर्द कभी भी बढ़ जाता था, तबीयत कभी भी खराब हो जाती थी ।कभी-कभी उसका मन बच्चों के साथ खुदकुशी कर लेने को भी करता था, पर वह हार मानने को तैयार नहीं थी। वह लड़ रही थी खुद से , हालात से ,परिवार से, समाज से ।

आठवें महीने के 12वे दिन निन्नी दर्द से मरी जा रही थी ।उसकी चीखें सुन बगल की कुछ औरतें आई। सभी ने निन्नी को हॉस्पिटल पहुंचाया । हॉस्पिटल की आशा ने बताया कि बच्चा अठमासु (यानी कि 8 महीने में पैदा होने वाला) है। डिलीवरी शुरू हुई निन्नी की चीखें अस्पताल के बाहर तक जा रही थी। यूं तो इससे पहले भी उसने यह दर्द दो बार सहा था पर यह उस से बढ़कर था। निन्नी बेहोश हो गई। आधे घंटे की जद्दोजहद के बाद डॉक्टर ने बाहर आकर सब को बताया कि लड़का हुआ है। सब खुश हुए। वह लड़का जिसकी उम्मीद निन्नी की सास लगाए हुई थी, लड़का जो निन्नी  की आगे की जिंदगी की भी उम्मीद  था । निन्नी भी अब होश में आई ।सरकारी अस्पताल की आशा ने सरकारी सहायता के 1100 रुपए और बच्चे को लाकर निन्नी की गोद में रख दिया और बताया कि लड़का मरा  पैदा हुआ था। कमजोरी के कारण जच्चा बच्चा दोनों ने ही हिम्मत छोड़ दी थी। पर किसी तरह डॉक्टर ने निन्नी  को बचाने का फैसला किया साधारण माओं की तरह रोना-धोना किए बिना। निन्नी उस बच्चे और 11 सौ रुपए लेकर अस्पताल से घर आ गई । अब वो पत्थर की हो चुकी थी ।उसका बेटा मरा था ।वो बेटा जिसकी सबको आस थी।

 किसने मारा उसे? निन्नी बस ये सवाल जानती थी। जवाब किसी के पास नहीं था ।

उसने फावड़ा उठाया और उसी खेत में उसे गाड़ आई ,जिस खेत का अनाज उसके घर में था।

 हर महीने उसकी बेटी उसके सास से पैसे ले आती थी। दो-तीन महीने बाद निन्नी खुद पैसे लाने जाने लगी। सब कुछ पहले की तरह होने लगा किसी के लिए कुछ नहीं बदला। निन्नी ने बड़ी लड़की का नाम पास के हीं प्राथमिक विद्यालय में लिखवा दिया ।और खुद छोटी बेटी को लेकर पापड़ बनाने वाली एक छोटी सी संस्था में काम करने लगी ।किसी को इस घटना से कोई फर्क नहीं पड़ा सिवाए मेरे ।

"ऐसा क्यों कह रहा है"-साकेत ने मेरे कंधे पर हाथ रखते हुए कहा।

मैं फिर से रोने लगा। और भी ज्यादा रोने लगा । साकेत ने मुझे चुप कराते हुए कहा- यार ऐसा तो होता रहता है तू उसे जानता था इसलिए तुझे ज्यादा फील हो रहा है।

दिशा - पर तू इतना रो क्यों रहा है राहुल।

रोने की सिसकियों के बीच मैंने अचानक कहा -क्योंकि वो मेरी चचेरी बहन थी, इसके बाद मुझसे कुछ मत पूछना।

ये कहकर मैं वहां से चला गया। उन्होंने भी कभी मुझसे इस बारे में कुछ नहीं पूछा।

 ऐसी ही "निन्नी" जैसी कोई अगर कहीं मिले ,जो अपने घर ,परिवार ,समाज और धर्म के हाथों मर रही हो। तो उसे आजाद करने की कोशिश कीजिएगा। मैं नहीं कर पाया।

एक खत आधी आबादी के नाम


हैलो आधी आबादी
सलाम
आज फिर एक खबर पढ़ा अखबार में और फिर उस पर लोगों की भद्दी टिप्पणीयाँ…कुछ लोगों ने गुस्सा भी दिखाया और फाँसी की मांग कर डाली…अखबार हाथ में पकडे ही मैं सोचने लगा की कोई एसा कैसे कर सकता है? समझ में ये आया कि बलात्कार और उस पर ये भद्दी प्रतिक्रियाएँ बिमारी नहीं है… ये तो बिमारी के लक्षण हैं सबसे भयानक वाले…बिमारी तो कुछ और ही है…तभी तुम्हे ख़त लिखने का ख़याल आया क्यूंकि इस सवाल का जवाब तो तुम भी ढूँढ रही होगी…
अभी तुम खाना बना रही होगी मुस्कुराते हुए ये सोचकर कि कॉलेज के फंक्शन में तुम्हारे गाने पर पूरा हॉल तालियों से कैसे गूंज गया था. या तुम ऑफिस में बैठे भन्ना रही होगी कि तुम्हे सिर्फ इस बात पर प्रोजेक्ट नहीं मिला कि तुम औरत हो. शर्ट खरीद रही होगी भाई के लिए ताकि वो तुम्हे टूर पर जाने की परमिशन दिलाने में हेल्प करे. बहाना सोच रही होगी, जो घरवालों से कहकर जा सको अपने बॉयफ्रेंड से मिलने ताकि उसके बॉस की डांट का गुस्सा तुम पर न निकले. मिठाई बना रही होगी बेटे के लिए कि पता नहीं फिर कब लौटेगा, मिठाई खायेगा तो याद कर शायद फोन कर लेगा…
इस वजह से हो सकता है तुम इतना लम्बा ख़त ना पढ़ पाओ…सो कोई बात नहीं जब समय मिले तब पढ़ लेना…वैसे भी बहुत ज़िम्मेदारियाँ हैं तुम पर…
ये हमने ही तय किया है कि ज़िम्मेदारियाँ जयादातर तुम्हारी रहेंगी और अधिकार जयादातर हमारे. ये भी हमने ही तय किया है कि तुम अपनी जिंदगी कैसे जियोगी. तुम क्या पहनोगी, कहाँ जाओगी, कैसे बात करोगी, किससे बात करोगी…मोबाइल से लेकर करियर तक तुम्हारे लिए हम तय करते हैं. गोया कि तुम्हारी जिंदगी पर भी हमारा अधिकार है…
पर अधिकार इंसान पर? हह…तुम्हे हम इंसान मानते ही कहाँ हैं. तुम तो एक साधन हो हमारी जिंदगी को आसान बनाने का. इसीलिए तुम्हारा महत्व तुम्हारी उपयोगिता और आज्ञाकारिता से तय करते हैं हम… और शायद इसीलिए हम तुम्हारे पहरेदार बन जाते हैं तुम्हे नियमों में बांधकर और बचाने का नाटक करते हैं हमारे ही उस किरदार से जो तुम्हे महज एक देह समजता है जिसकी कोई आत्मा या मन नहीं होता…बिलकुल एक वस्तु की तरह…
पर तुम ये सब क्यूँ मानती हो? क्यूंकि जब तुम ये सब मानती हो तो हम तुम्हारी तारीफ़ करते हैं, तुम्हारा ख़याल रखते हैं, तुम्हे देवी कहते हैं…तुम इन सबसे खुश हो जाती हो… बहुत भोली हो तुम…तुम ये नहीं समझ पाती कि इतने से दिखावे के सहारे हम तुम्हारे लिए दायरा तय कर देते हैं जिससे बाहर नहीं जाना है तुम्हे, तुम्हारे आचरण के नियम तय कर देते हैं जिनसे हमारी प्रभुता बनी रहे…पर तुम भी क्या करो? जब तुम ये सब मानने से मना करती हो या थोड़ा भी अपने हक की बात करती हो तो हम तुमसे नाराज़ हो जाते हैं, तुम्हे हमारे गुस्से का सामना करना पड़ता है कई तरह से…तब तुम हमारे लिए देवी से डेविल हो जाती हो…और तुम हिम्मत नहीं कर पाती इन सब का सामना करने की… ये तरीका हम हर रिश्ते कि आड़ में अपनाते हैं, पिता, भाई, दोस्त, प्रेमी, पति, बॉस, सहकर्मी या समाज के हिस्से के तौर पर… और हममें से जयादातर वो लोग ये करते हैं जिनमें असुरक्षा की भावना होती है पितृसत्ता छीन जाने की… एसा करके वो उनकी मर्दानगी का पुष्टिकरण करते रहते हैं…
पता नहीं तुम कभी हिम्मत कर भी पाओगी या नहीं पर कोशिश करना… कोशिश करना तारीफों के जाल में नहीं फसने की…कोशिश करना अगली बार जब कोई तुम्हे डेविल कहे तो कहने की कि “माइंड योर ओन बिज़नेस”…कम से कम समझाने की कोशिश करना धीरे से शायद समझ जाए, नहीं तो फिर से कोशिश करना…कोशिश करना तुम्हे घूरने या छूने वाले को चुपचाप नहीं सहन करने की…जानता हूँ बहुत मुश्किल है वो भी ये जानते हुए कि बहुत लोग साथ नहीं होंगे तुम्हारे…
पर मैं तुम्हारे साथ रहूँगा वादा करता हूँ…माँ, बहन, दोस्त, प्रेमिका, पत्नी, बेटी या इनमे से किसी नाम से तय नहीं होने वाले रिश्ते के रूप में तुम्हे हिम्मत करते देखूंगा तो तुम्हारा साथ दूंगा, तुम्हारे पहरेदार या सहारे के तौर पर नहीं, जानता हूँ तुम्हे उसकी जरूरत नहीं है तुम बहुत मजबूत हो, पर तुम्हारे साथी के रूप में कि जब तुम हार मानने लगो तो फिर कोशिश करने कि हिम्मत दे सकूँ, और जब तुम जीत जाओ तो तुम्हारे जश्न में शामिल हो सकूँ…
एक वादा तुम्हे भी करना होगा कि तुम किसी भी तरह से दूसरी औरत के शोषण का कारण नहीं बनोगी, तुम अक्सर एसा कर बैठती हो किसी रिश्ते की मर्दवादी धौंस पूरा करवाने में…वादा करो की जिन्दगी का मकसद हर कदम किसी पुरुष को खुश करने को नहीं बनाओगी…
आखिर में एक छोटा वादा और…अबकी बार घर आऊंगा तो चाय मैं बनाऊंगा, और सब्जी भी…तुम रोकना मत…क्योंकि तुम सिर्फ 'काम' के लिए नही हो।
#Gunjan_ki_kalam_se

Friday, February 17, 2017

नास्तिकता

धर्म के विरोध में लेखन मरते दम तक चौकाने वाला विवादास्पद आधुनिक झझकोरनेवाला और विद्रोही होता है ।
मैं कोई लेखक नहीं हूं ,ना ही कोई दार्शनिक ग्रेजुएशन कर रहा हूं पर इतनी दुनिया जरूर देखी है कि सही गलत का फैसला कर सकूं ।यहां मैं जो भी विचार प्रकट कर रहा हूं वह पूरी तरह से वास्तविक जीवन एवं घटनाओं से प्रेरित है ,एवं बहुत हद तक मेरे स्वयं के अनुभव  से भी प्रेरित है ।
"धर्म", एक ऐसा विवादित संगठन, जिसे सब अपने-अपने तरीके से परिभाषित करते हैं मैं भी इसे अपनी तरह से परिभाषित करना चाहूंगा । 'धर्म ऐसे अव्यवहारिक नियमों एवं तर्कों का समूह है ,जो मनुष्य को अपनी चेतना शक्ति को शुन्य कर बेतुके नियमों पर चलने को विवश करता है'।
अब प्रश्न उठता है कि लेखन की शुरुआत उस काल्पनिक ईश्वर से ना कर के धर्म से क्यों की गई ।इसके पीछे भी सामान्य सा तर्क यह है कि ईश्वर तो काल्पनिक है ।उसकी शक्तियां एवं किस्से भी बनावटी हैं। पर अगर कोई इन शक्तियों , किस्सों एवं ईश्वर को सत्य साबित करने पर तुला हुआ है तो वह है धर्म ।ईश्वर तो केवल इन धार्मिक हाथों की कठपुतलियां हैं ।इसलिए लेखन की शुरुआत धर्म से की गई है अक्सर लोगों को अपने धर्म के प्रति इतना निष्ठावान देखा जितना वह अपने माता पिता के लिए भी नहीं है मुझे इसके पीछे का तर्क समझ नहीं आता वह चीज जिसे आपने अपने जन्म के बाद खुद से चुना भी नहीं । वह चीज जो आप पर जन्म के 1 मिनट बाद ही आपके नामकरण के साथ ही थोप दी गई। उसके प्रति इतनी निष्ठा और वह माता पिता जिनसे आप की उत्पत्ति हुई, वह समाज जिसमें आपका भरणपोषण हुआ उसके प्रति निष्ठा कहां गई ?आज अगर कोई व्यक्ति आपके सामने दम तोड़ रहा हो तो क्या आप उसकी सहायता नहीं करेंगे ?निश्चित करेंगे क्योंकि आपके अंतर्मन ने यह जानने की इच्छा प्रकट नहीं की ,कि अमुक व्यक्ति किस जाति या धर्म का है पर अगर उसी व्यक्ति को आप धर्म रूपी चश्मे से देखें तो आप एक बार जरूर यह सोचेंगे कि यह वही व्यक्ति है जिसने कभी गाय या सूअर का मांस खाया होगा ।क्या गाय या सूअर के मांस खा लेने से वह व्यक्ति मानव नहीं रहा क्या उस कृत्य से वह समाज से परित्यक्त हो गया ?नहीं ।आपके धर्म ने उस व्यक्ति को अपने प्रति उदासीन समझा इसलिए वह व्यक्ति जो किसी दूसरे धर्म का है आपने उसकी सहायता नहीं की आप की धार्मिक निष्ठता ,आपके समाजिक जिम्मेदारी पर भारी पर गई ।
मेरा मानना है कि 'धर्म और ईश्वर मनुष्य द्वारा रचित सबसे भयावह रचना है '।ऐसा इसलिए क्योंकि आज का मनुष्य बटा हुआ है ।पर जो चीज़ इसमें खास है वह यह है कि बटवारे का आधार व्यंग्यात्मक है ।जैसे ब्राह्मण, क्षत्रिय ,वैश्य, शूद्र ,हिंदू ,मुस्लिम ,सिख, ईसाई, बौद्ध ,जैन ,शिया ,सुन्नी ,कैथोलिक ,प्रोटेस्टेंट, तिब्बती, चीनी ,पूर्वी, पश्चिमी, बौद्ध, फिर जातियां ,फिर कोटियां, फिर वर्ग ।
पर क्या वाकई मानव इतना बंटा ही पैदा हुआ होगा? सोचियेगा ज़रूर।

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