Thursday, April 20, 2017

कविता:काश की तुम सच बन जाओ

ट्रैफिक सी हो गई है जिंदगी,
काश कि तुम जाम बन जाओ,
थक कर इंतजार करूं मैं जिसका
ऐसी कोई शाम बन जाओ

खबरों में खबर नहीं रहती
काश कि तुम अखबार बन जाओ
बेवजह ही बीत जाती है छुट्टियां, जो बचपन याद दिलाएं
ऐसी कोई रविवार बन जाओ

पहले से शब्द नहीं आते अब जहन में
काश कि तुम खयाल बन जाओ
पोछ दे जो गलतियों को बीते कल से
ऐसी कोई रुमाल बन जाओ

बस सफर नजर आता है दूर तलक
काश कि तुम मकाम बन जाओ
दरवाजे और खिड़कियों के अलावा कोई हो जहां साथ
ऐसा कोई मकान बन जाओ

कोई पहचानता नहीं एक-दूसरे को यहां
काश कि तुम शहर बन जाओ
होने न दे इंसान को अलग जो इंसान से
ऐसी कोई गिरह बन जाओ

धर्म ईश्वर जाति वर्ण बेवजह हैं सब
काश कि तुम प्यार बन जाओ
इंसानियत हो जहां सबसे ऊपर
ऐसा कोई संसार बन जाओ

दब चुके हैं दंगों तले लोग यहां
काश कि तुम सरकार बन जाओ
आवाज ला दे जो सबकी जुबान पर
ऐसा कोई अधिकार बन जाओ

कैद क्यों हो बुर्कों मकानों और मर्दानों में
काश कि तुम हवा बन जाओ
सुबह शाम की खुराक में जो सुधार दे रुढ़िवादिता को
ऐसी कोई दवा बन जाओ

अधूरे हैं हम अधूरी है ये दुनिया
काश कि तुम सच बन जाओ
सीमाएं सेना बारूद गोलियां न हो जहां
ऐसी कोई हकीकत बन जाओ
ऐसी कोई हकीकत बन जाओ
#Gunjan_ki_kalam_se

with love from Gunjan Goswami

8 मार्च, बिंदास लईकी

लड़कियों, महिलाओं या अब की भाषा में आधी आबादी सुनो, तुम/आप न ! लड़कों की बराबरी करने की कोशिश भी मत करना !

इसलिए नहीं, क्योंकि तुम/आप लड़कों की बराबरी कर नहीं सकती, बल्कि इसलिए, क्योंकि तुम/आप हम लड़कों से बहुत बेहतर हो. और ये सिर्फ़ मैं इसलिए नहीं कह रहा क्योंकि आज 8 मार्च है. ऐसा साइंस कहता है. स्टैट्स कहते हैं. और तमाम हज़ार साल का इंसानी तजुर्बा कहता है.

इसलिए मेरी तुमसे गुज़ारिश है कि  प्लीज़ ! तुम/आप हम लड़कों जैसा बनकर दुनिया को कम-क़ाबिल और अधिक-बोरिंग मत बना देना.

साइंस और स्टैट्स की बात करें? तुम्हें/आपको मालूम भी नहीं होगा कि तुम्हारा/आपका दिल लड़कों से अधिक तेज़ धड़कता है. हर मिनट पूरे 8 बीट्स अधिक. मिनट में 78 बार. शायद इसीलिए तुम/आप हम लड़कों से अधिक प्यारी और दिल-क़श होती हो. पास से गुज़र जाती हो तो हमारा दिल धक् से हो जाता है (शायद इसीलिए हम तुमसे/आपसेे 8 बीट्स कम रह जाते हैं)

जानती हो? दसवीं और बारहवीं में लडकियाँ हर इक साल लड़कों से बेहतर ग्रेड्स लाती हैं, और ये स्टैट्स सिर्फ़ हमारे देश का ही नहीं है. ग्लोबल है. ग़र अब जो कोई तुम्हारे IQ का मज़ाक उड़ाए या फिर ये कहे कि लडकियाँ ख़राब ड्राइवर होती हैं तो ये फैक्ट उसके मुह पर मारना. इन फैक्ट ड्राइविंग तो हम' भूल जाते हैं, ग़र जो कभी सिग्नल पर तुम/आप दिख जाती हो (यू ड्राइव उस क्रेज़ी)

- साइंस कहता है कि लडकियाँ लड़कों से जल्दी और कमतर उम्र में चलना और बोलना सीख जाती हैं. जहाँ एक लडकी का दिमाग़ दस साल में मच्योर हो जाता है, लड़कों का दिमाग़ 15 से 20 साल में मच्योर हो पाता है

- तुम/आप एक मिनट में 250 शब्द बोल सकती हो और हम लड़के महज़ 150. तुम/आप इतनी एक्सप्रेसिव कैसे हो . और बोलती भी कितना प्यारा हो. हम तो जैसे सब छिपा जाते हैं, रोते भी नहीं हैं, दिल में इतना भर लेते हैं कि दिल काठ का हो जाता है. निष्ठुर हो जाता है

तुम/आप एक नए इन्सान को भी गढ़ती हो, माँ बन कर कितने प्यार से हमें पालती-पोसती हो. ख़याल रखती हो. हम तो  ख़ुद का भी ध्यान रख लें, तो बहुत है. पिछले महीने जो मफलर खोई थीं, वो आज तक नहीं मिलीं

इसीलिए यार, तुम/आप हमारे जैसी होने की कोशिश बिलकुल भी मत करना. तुम/आप ऐसी ही प्यारी, मज़बूत और क़ाबिल रहना. थोड़ी पगली सी, बहुत सारी केयरिंग सी, थोड़ी मूडी सी, बे-इन्तहा ख़ूबसूरत सी. और बिलकुल लड़कियों सी. रहना. ऐसी ही. एकदम.

ऐसी ही. बिंदास, लड़कियों सी.
#Gunjan_ki_kalam_se

अपनी जड़ें

Note फ़ॉर जुगनू; खूब घूमना चाहिए. यहां, वहां, सारे जहां में। नया शहर, नया कस्बा, नया देश सबको देखना चाहिए, खूब ही सारे नये लोगों से मिलना चाहिए, खूब ही सारी नयी बातें करनी चाहिए, दुनिया की दौड़ में सरपट भागो।

लेकिन बीच-बीच में थोड़ा रुकना भी चाहिए। अपनी जड़ों को थोड़ा रुककर टटोलना भी चाहिए।

उस नदी को याद करना जिसके किनारे बैठ कर तुमने अपने बचपन की कई शामें बितायी थी, उन दोस्तों को याद करना जिनके साथ आम के बगीचे में गर्म दुपहरें काटी थी, उन खेतों को याद रखना जिनमें कभी तुमने फसल बोयी थी,

उन तितलियों को याद रखना जिनके पीछे भागा करते थे, उस घास पर लेटना याद में रखना जहां लिखा था प्रेम में पहला खत, उन पगडंडियों को जिनसे होकर हर रोज तुम बाजार जाया करते थे,

उस स्कूल को याद रखना जहां पहली बार फुटबॉल खेलते हुए तुमने पैर तुड़वा ली थी, साईकिल से स्कूल जा रहे दिनों में किसी चाय दुकान पर पैसे चंदा कर दोस्तों के साथ की गयी पार्टी को याद रखना।

उन लोगों को याद रखना जिनकी ऊंगली पकड़ चलना सीखा था, उन्हें भी याद करना जिनकी साईकिल पर बैठ तुमने पहली बार गाँव की सरहद पार की थी, उस लोकल ट्रेन को जो तुम्हें हर महीने शहर पहुंचाया करती थी, उन यात्राओं में मिले लोगों के चेहरे को याद करने की कोशिश करना,

कभी-कभी उन्हें भी फोन कर लेना जिनके कंधे पर मेला देखने जाया करते थे, उस दोस्त को याद रखना जिसके साथ 'बडे़ होकर कुछ बनने' का सपना देखा करते थे, आज वह नहीं है, कभी उसे खोजने की कोशिश करना..

कि पूरी दुनिया घूमना खूबसूरत है, लेकिन जड़ों की तरफ लौटने से बड़ा सुख कुछ भी नहीं..

Sunday, April 16, 2017

मुझे आज़ादी नही चाहिए, बस गुलामियों से छुटकारा दिला दो।

अगर तुम भी आज़ादी के लिए लड़ रहे हो या इसका समर्थन कर रहे हो, तो हां बेवकूफ हो तुम। क्योंकि लड़ने से कभी आज़ादी नहीं मिलती। बस गुलामी शिफ्ट हो जाती है, जैसा कि अब तक होता आया है। हम जानवर थे। खुद से लड़े तो इंसान बन गए, अपने ही दिमाग़ के गुलाम। फिर एक दूसरे से लड़े और एक दूसरे के गुलाम। फलाना व्यक्ति फलाने का गुलाम। फलाना राज्य फलाने का गुलाम। फलाना देश फलाने का गुलाम। हम भी गुलाम थे। फिर हमने आज़ादी की लड़ाई लड़ी और आखिर 15 अगस्त 1947 को हम… आजाद नहीं हुए, बल्कि इस दिन हमारी गुलामी शिफ्ट हो गई।

हम अब अंग्रेजों के गुलाम नहीं रहे, अब हम खुद के द्वारा चुने गए बेवकूफों के गुलाम हो गए। अब चलते हैं थोड़े पीछे, बाप-दादाओं वाले पीछे नहीं। मतलब बहुत्ते वाले पीछे, एवोलुशन वाले टाइम में। सोचता हूं कि जब जीवन इस ग्रह पर आया होगा या जब पृथ्वी बनी होगी, तो क्या तब भी भारत पाकिस्तान अमेरिका या दूसरे देश यूंही बॉर्डर बनाकर खड़े होंगे? ‘नहीं’ यही जवाब होगा शायद आपका भी।

तब से लेकर अब तक, हम गुलाम ही हैं। हम अपने-अपने देशों में एक ऐसी ज़मीन के टुकड़े के लिए लड़ रहे हैं जो असल में टुकड़ा है ही नहीं। यह तो धरती है जैसी भारत की है वैसी पाकिस्तान की, जैसी चीन की है वैसे ही रूस की। उस टुकड़े की राष्ट्रभक्ति के पीछे न जाने कितनी ही जाने गई है अब तक। हम एक ऐसे धर्म के गुलाम हैं जो हमने खुद से चुना भी नहीं है, हमारी ही तरह किसी आदमी ने धर्मों को बनाया और उस काल्पनिक धर्म की रक्षा के पीछे न जाने कितने ही दंगे हुए।

क्या हम ऐसे ही आए होंगे पृथ्वी पर? क्या प्रकृति ने हमें यूं ही बांट कर भेजा होगा? क्या हम भारतीय, अमेरिकी, पाकिस्तानी या अन्य देशों के न होकर एक बेहतर विश्व के नागरिक नहीं हो सकते हैं? क्या हम हिंदू, मुस्लिम, सिख, या इसाई धर्म को छोड़कर मानव धर्म नहीं चुन सकते। क्या हम गुलामियों में शिफ्ट न होकर “आज़ाद” नहीं हो सकते।

Sunday, April 9, 2017

चलो फिर अजनबी बन जाएं।

चलो फिर अजनबी से शुरूआत करते हैं ,
तुम्हें मनाने की मशक्कतें फिर से आज करते हैं,
नजरों से नजरें बचा, तेरा फिर से आज दीदार करते हैं,
पल भर कि उस एक झलक पर, फिर से आज जा निसार करते हैं, चलो फिर अजनबी से शुरूआत करते हैं।
Facebook और WhatsApp के जमाने में चलो फिर से चिट्ठे पुर्जो की बात करते हैं ,
मोटर बाइकों की इस भीड़ में ,
उसी पुरानी साइकिल पर चलो फिर से हम आज चलते हैं ,
वीडियो कॉल्स तो आम सी बात हो गई, पर चलो फिर आज हम रूहों से बात करते हैं,
चलो फिर अजनबी से शुरूआत करते हैं ।
इस दफा हो सके तो हां कह देना तुम, इस अजनबी में हो सके ,तो अपना कल देख लेना तुम,
जो ना हो तो वो भी, कह जरूर देना तुम,
चुपके से ही सही ,पर तुम्हें याद हम करेंगे ,
पल पल तुम्हें पाने की ,फरियाद हम करेंगे ,
इस दफा न मिले तो क्या ,
कल फिर अजनबी से शुरूआत हम करेंगे ,
तुम्हें मनाने की मशक्कतें फिर  हम करेंगे
तुम्हें मनाने की मशक्कतें फिर  हम करेंगे।
#Gunjan_ki_kalam_se

Thursday, April 6, 2017

मेरी पहली वैचारिक हार मेरे लोकतंत्र को मुबारक हो

मैं कौन हूं ? खुद से जब यह सवाल करता हूं , तो हर बार बस एक ही उत्तर मिलता है। एक हारा हुआ लाचार आदमी।
पर ये उपाधि मैंने स्वयं को पहले से नहीं दी थी । बल्कि वर्तमान सिस्टम पर मेरा पहला वार उल्टा मुझ पर भारी पड़ गया। जब मैं शांत था, सिस्टम के हिसाब से चल रहा था। तब तक चीजें सामान्य थी । पर सिस्टम पर किए गए पहले सवाल ने, मेरे लिए सब बदल दिया।
एक सामान्य आदमी कितना कमजोर हो सकता है ,यह मुझे अंदाजा लग गया। देश कितना खोखला है अंदर से बिल्कुल एक ग्लोब की तरह यह भी मुझे अंदाजा लग गया।
मैं बात कर रहा हूं अपने गृह पंचायत सिंघेश्वर की। बिहार के मधेपुरा जिला से 6 किलोमीटर दूर । दरअसल छुट्टियों में मैं घर आया हुआ था । सोचा अब रामनवमी के बाद ही जाऊंगा। एक दिन यूं ही मां ने बताया कि गैस खत्म हो गया है । मैंने गैस एजेंसी में पता लगाया तो पता लगा कि शाम को गैस की गाड़ी आने वाली है ।शाम को मैंने गैस ले लिया । पर थोड़ा आश्चर्य हुआ की गैस के दाम मुझसे 860 लिए गए। दूसरों से पूछा तो यह जाना कि उन से 880 या कभी 870 भी लिए जाते हैं । और बदले में न कोई स्लीप न कोई कैश मेमो दिया जाता है।
Google किया तो देखा कि बिहार में वर्तमान गैस के दाम ₹824 थे। मतलब मेरे शहर में हर उपभोगता से 36से56 रुपए तक मनमानी वसूली हो रही थी। एजेंसी फोन करके पूछा तो उन्होंने बताया कि गैस के दाम बढ़े हैं ।उपभोक्ताओं से सही पैसे लिए जा रहे हैं ।
पर मैं इस जवाब से संतुष्ट नहीं था। मैंने ट्विटर पर धर्मेंद्र प्रधान , मिनिस्ट्री ऑफ पेट्रोलियम एंड नेचुरल गैस तथा इंडेन गैस ऑनलाइन को मेंशन करते हुए अपनी बात बताई । 2 घंटे बाद मुझे रिप्लाई आया । सरकार का ड्यूरेशन ऑफ़ रिस्पांस देख कर खुशी हुई । उन्होंने मेरी बात लोकल अथॉरिटी तक पहुंचा दी।मैंने भी उन्हें अपना  कंजुमर नंबर तथा कांटेक्ट नंबर दिया। पर उससे कुछ नहीं हुआ। मुझे लगा कि लोकल लेवल पर आ कर बात दब गई। लेकिन उसके अगले दिन मतलब कंप्लेंट के तीसरे दिन । दोपहर को जब मैं घर पर नहीं था ।तब दो लोग घर पर आए । और मेरे बारे में मां से पूछा । मैं घर पर नही था इसलिये माँ ने उन्हें थोड़ी देर बाद आने को कहा। क्योंकि माँ को इन बातों के बारे में कुछ पता नहीं था। शाम को मैं घर आया तो माँ ने पूछा कि क्या तुमने गैस एजेंसी में कोई कंप्लेन किया है । कुछ लोग आए थे तुम्हें ढूंढने । मैंने बताया कि हां मैंने कंप्लेंट किया था । थोड़ी देर बाद मुझे एक कॉल आया। यह कॉल गैस एजेंसी के मालिक का था । उन्होंने मुझे गैस ऑफिस पर बुलाया। मैंने बताया कि मैं घर पर ही हूं , थोड़ी देर में आता हूं ।
फिर यह बात भी मैंने घर पर मां को बताई। पापा घर पर नहीं थे ,माँ घबरा गई। उन्होंने मुझे जाने से मना किया। मां अब गुस्से में थी ।और मुझे डांटते हुए बोली की गैस एजेंसी का मालिक कई सारे अपराध में लिप्त है। यह गैस एजेंसी भी उसकी दहशत का ही नतीजा है ।
हम बातें कर ही रहे थे कि दो लोग दरवाजे पर आए ,और मेरा नाम लेने लगे । मैंने उन्हें अंदर बुलाया और हमारी बातचीत शुरू हुई ।
पहला आदमी - तुमने ही कंप्लेन की थी?
मैं- हां।
पहला आदमी- क्यों ?
मैं- मुझे लगा कि मुझसे ज्यादा पैसे लिए गए । और बदले में कोई स्लिप या कॅश मेमो नहीं दिया गया। इस कारण मुझे अंदाजा नहीं लग रहा था कि गैस के दाम बढे हैं या नही।
पहला आदमी -तो तुम सीधे मेल कर दोगे ? इसलिए पढ़ाया गया है तुम्हें। तुम्हें पहले एजेंसी फोन करना चाहिए था ।
मैं- मैंने फोन किया था। उन्होंने कहा कि दाम बढ़ गए हैं।
पहला आदमी- शुक्र करो कि तुम्हारे पापा से जान पहचान है। तुम्हारे अलावा कोई और रहता तो बात मालिक तक जाती भी नहीं । इस तरह करोगे तो मां पापा के लिए परेशानी होगी।
मां घबरा रही थी ,और यह घबड़ाहट उनके चेहरे से साफ झलक रही थी। दूसरा आदमी- चलो चलकर कंप्लेंट वापस ले लो । मैं फिर बाइक से तुम्हें घर छोड़ दूंगा  
मां की घबड़ाहट देख मैं खुद भी डर गया । यह सब मेरे साथ पहली बार हो रहा था। फिर भी मैं उनके साथ गैस एजेंसी जाने लगा ।
वहां पहुंचा तो गैस एजेंसी के मालिक ने मुझे अपनी राजनीतिक पहुंच बताई । बताया कि उसने कई डीएम एसपी तक का तबादला करा दिया है। मैं अभी बहुत छोटा हूं। ऐसी-ऐसी कई कंप्लेंट आई और गई पर उसका कुछ नहीं बिगड़ा । उसने मुझसे कंप्लेंट वापस लेने को कहा ।
मेरे सामने मेरी मां का वह डरा हुआ चेहरा था । मैं लाचार था।
उसने मुझसे एक आवेदन लिखवाया। अपनी मर्जी से । आवेदन ये की  कैश मेमो मेरे घर पर मेरी मां को दिया गया था , जिसके मुताबिक गैस का दाम सही था। और मुझे इसकी जानकारी नहीं थी । फिर मेरे सिग्नेचर भी लिए ।
इस आवेदन का एक-एक शब्द मेरी वैचारिक हार थी । इसके एक एक शब्द ने लोकतंत्र तथा कानून व्यवस्था पर तमाचा जड़ा था।
मैं वापस घर आ गया । बात आग की तरह गांव में फैल गई। कई लोग आए घर पर । सब को यही लगा की गैस एजेंसी वाले मुझे उठा कर ले गए थे । सबने एक ही बात कही की क्यों यह सब कर रहे हो। सब कोई देते हैं ना बढ़े हुए दाम । जो वह बोलते हैं वह देना ही पड़ेगा । वे लोग दबंग हैं। राजनीति में सक्रिय हैं । इग्नोर करना सीखो। जिंदगी ऐसे नहीं चलती। समाज में रहना है तो इसके हिसाब से चलना होगा । अभी इन सब में मत पड़ो अपने करियर पर ध्यान दो। यह अंतिम बात थी जो मैंने उस दिन की। सब के सब मुझे लाचार लग रहे थे । सब साथ खड़े होने के बावजूद अकेले लग रहे थे ।
तबसे यह लिखने तक मैं अंदर ही अंदर चित्कार रहा हूं। इस चीख को सुनने वाला कोई नहीं । देश और समाज का एक हिस्सा होने के नाते मुझे अपनी औकात का अंदाजा लग गया ।
आज अपराधी होना आसान है पर विद्रोही नहीं ।
मेरी पहली वैचारिक हार मेरे लोकतंत्र को मुबारक हो। अगर समाज में जीना है तो ऐसी वैचारिक हारों की आदत डालनी होगी।