Wednesday, January 24, 2018

मैं बिहार


अब बात ज़ुबां पर आई है,
तुम सुनना ज़रा सा गौर से,
अब शुरू हुई पुरवाई है ,
तुम चलना ज़रा सा गौर से,
एक लड़का है उखड़ा-उखड़ा,
तुम सब के झूठे प्यार से,
एक लड़का है सहमा-सहमा,
वो शायद है 'बिहार' से,
ये गलती है उसने जो की,
वो आया दूजे राज्य से,
डरपोक नहीं वो चिंतित है,
बढ़ते भारत के भाग्य से,
एक मंच मिला मेरी ही तरह,
तो उसने शुरू कहानी की,
हर बिहारी के दुख दर्द को,
उसने अपनी जुबानी दी,
फिर शुरू हुआ एक शोषित का,
शोषण से भरा माफीनामा,
फिर शुरू हुआ इतिहास का,
गौरवशाली कीर्तिनामा ,
तुम्हें शून्य मिला उस शून्य का,
जन्मदाता एक बिहारी है,
हुआ लोकतंत्र का जन्म जहां,
वैशाली वो बिहारी है,
अशोक चंद्रगुप्त और न जाने कितने,
वीरों का खून बिहारी है,
हुई शिक्षा की शुरुआत जहां,
वो नालंदा बिहारी है,
हैं अतिथि जहां देवो भवः,
वह महाराष्ट्र नहीं बिहार है,
जहां युद्ध करो तो सुई नहीं,
मोहब्बत में हाज़िर जान है,
सरहद पर बेटों के बेटे,
और पीढ़ियां भी कुर्बान है,
उस पुण्य भूमि का बेटा हूं मैं,
यही मेरी पहचान है,
'बिहारी' गाली नहीं एक ओहदा है,
ये मेरा गुरुर, यही मेरा अभिमान है,
ये मेरा गुरुर, यही मेरा अभिमान है।।

मेरी कल्पना: तुम


सच और झूठ,
मैं दोनों बोलता हूं,
मुझे दोनों ही चाहिए।
दोनों ही पूरक है एक-दूजे के,
जैसे चीर देता है प्रकाश ,अंधेरे को
पर सोते वक्त चाहिए होता है अंधकार तुम्हें,
जैसे हर वक्त अंधकार बुरा नहीं होता ,
बस वैसे हर वक़्त प्रकाश ठीक नही होता,
काल्पनिक होना, न होने के बराबर मान लेते हैं लोग,
ये गलत है,
क्योकि कल्पना, वास्तविकता का ही तो पूरक है,
जैसे सोचोगे नही, तो करोगे कैसे?
करोगे नही, तो होगा कैसे?
हुआ नही तो वास्तविकता भी नही।
अतः कल्पना ही आधार है वास्तविकता का।
प्रेम ही आधार है जीवन का।
जैसे काल्पनिक है मेरा प्रेम,
और वास्तविक हो , बस तुम।
Gunjan ki kalam se

Sunday, January 21, 2018

दहेज़ और बाल विवाह से निजात पाने के कारगर उपाय।


कल बिहार में बाल विवाह और दहेज प्रथा के उन्मूलन हेतु ,भव्य मानव श्रृंखला बनाने की कोशिश की गई थी। मुझे पता नहीं है कोशिश कितनी सफल या असफल हुई। क्योंकि मानव श्रृंखला को सफल या असफल मानने का कोई बराबर पैमाना नहीं था । जहां पक्ष के लोग इसे भारी सफल मान रहे है। वही विपक्ष के लोग इसे बिल्कुल ही असफल मान रहे हैं।
                   पर मुझे इन दोनों से ही कोई मतलब नहीं। क्योंकि सफलता या असफलता हमेशा धरातल पर दिखती है। जमीनी स्तर पर योजनाएं या फिर आपके संकल्प कितने सच साबित हुए सफलता या असफलता की गारंटी मानी जाती है ।
                कल का दिन मेरे लिए एक सामान्य दिनों की तरह ही था। मैं लाइन में लगकर दिखावे के संकल्प में भाग लेना नहीं चाहता था। और ना ही लाइन से बाहर आकर दहेज प्रथा और बाल विवाह को समर्थन देना चाहता था । हां एक खुशी जरूर हुई कि सरकार ने इस क्रम में एक सकारात्मक पहल की है। सामाजिक स्तर पर लोग बाल विवाह और दहेज प्रथा के बारे में बात करने लगे हैं। क्योंकि जिस प्रकार से सामाजिक बुराइयां सामाजिक मान्यताओं की जगह ले रही हैं, वो दिन दूर नहीं जब हत्या , अपहरण , रेप जैसी घटनाएं सामाजिक बुराइयों की जगह सामाजिक मान्यताओं का दर्जा प्राप्त कर लें।
              क्योंकि जब ये घटनाएं घटित होती है तो जिनके साथ ये होता है उनको छोड़कर अन्य किसी भी वर्ग पर इसका प्रभाव नहीं पड़ता।
                            कल भी मैं तटस्थ रहने की कोशिश कर रहा था । घर के पास की दुकान पर कुछ लोग खड़े थे। मैं भी वही बगल में खड़ा था। दुकान वाले भैया मेरे जान पहचान के थे। इसलिए उन्होंने कहा मानव श्रृंखला में सम्मिलित नहीं होंगे क्या? दुकान पर ही खड़े एक व्यक्ति ने दुकान वाले भैया से कहा- लगता है भाई जी दहेज लेकर ही शादी करेंगे। शायद उन्होंने एक व्यंग कसा था।  पर फिर भी मुझे इसका जवाब देना जरूरी लगा।
                        सबसे पहले मैंने उनका परिचय लिया। तो वह पास के ही किसी गांव के मध्य विद्यालय के मध्यान भोजन प्रभारी सह शिक्षक थे। मैंने उनसे कहा कि आपको क्या लगता है यहां जितने भी लोग हैं इस मानव श्रृंखला में वह कौन है ? उन्होंने जवाब दिया कि यह सारे लोग दहेज और बाल विवाह के खिलाफ संकल्पित होने के लिए क्या एकत्रित हुए हैं । मैंने कहा- नहीं ,मुझे ऐसा नहीं लगता । मुझे इसमें सिर्फ दो किस्म के लोग ही नजर आते हैं । पहले वो जिन्होंने दहेज लेकर ही विवाह किया है । और दूसरे वो दहेज़ क्या है? इसके बारे में कुछ पता ही नहीं है।
     
                   फिर मैंने उन्हें 1 साल पहले की बात याद दिलाते हुए उनसे पूछा कि आज से 1 साल पहले भी शराबबंदी के खिलाफ लोग यूं ही मानव श्रृंखला बनाकर एकत्रित हुए थे । मैं भी उसमें सम्मिलित हुआ था। मुझे आप बताइए कि उसके क्या फायदे हुए। उन्होंने बताया कि सरकार ने शराबबंदी के लिए एक बेहतर कानून लाया। जिससे लोगों में यह धारणा कायम हुई की शराब एक बुरी चीज है। जिसका सामाजिक स्तर पर बहिष्कार किया जाना चाहिए । तथा अब किसी की मजाल नहीं कि वह खुलेआम शराब पीकर घूम सके या फिर खुलेआम शराब खरीद सके । तो मैंने कहा की कुल मिलाकर आप यह कहना चाहते हैं कि नीतीश कुमार ने शराबबंदी कानून के तहत शराब जैसी सामाजिक बुराई को ढक दिया।
                तो उन्होंने भी हाँ में अपना सर हिलाया। तो मैंने कहा - पर दहेज तो सदियों सदियों से ढका हुआ ही है। कोई भी खुलकर दहेज नहीं लेता। बंद कमरे में दो लोगों के बीच दहेज की बातें होती है।
               फिर उन्होंने मुझसे सवाल किया । तो फिर आपके हिसाब से क्या कदम उठाए जाने चाहिए?
मेरे हिसाब से आने वाली भावी पीढ़ी या जो बच्चे विद्यालयों में पढ़ रहे है । उन्हें दहेज के नफे-नुकसान के बारे में पूरी जानकारी देनी चाहिए। उन्हें बताना चाहिए कि दहेज किस प्रकार समाज के लिए, परिवार के लिए घातक साबित होता है । उन्हें दहेज के कानूनों के बारे में पूरी जानकारी देनी चाहिए। क्योंकि जब तक हम स्वयं में किसी भी सामाजिक बुराई से लड़ने को तैयार नहीं हो जाते, सरकार की चेष्ठा नहीं होती कि वह हमसे उस सामाजिक बुराई को बंद करवा ले। क्योंकि हत्या, अपहरण, रेप जैसे कृत्यों पर कानून कब के बन चुके हैं। पर वह आज भी हो रहे हैं। लेकिन एक बड़ा वर्ग है ,जो यह मान चुका है अपने मन ही मन में ,की ये चीजें गलत है। ये चीजें नहीं करनी है । क्योंकि वह बड़ा वर्ग मानसिक रूप से तैयार है यह मानने के लिए कि क्या गलत है और क्या सही है । ठीक उसी प्रकार हमें आने वाली पीढ़ी को भी मानसिक रूप से तैयार करना होगा दहेज के खिलाफ भी।
 
        यह तो रही आने वाली पीढ़ी की बातें। वर्तमान के माता पिताओं को भी खुद में यह संकल्प लेना होगा कि किसी भी लड़की के विवाह में वह दहेज नहीं देंगे। और यह संकल्प हर लड़की के पिता को लेना ही होगा ।क्योंकि इस चक्र में अगर एक भी जगह किसी ने दहेज दिया जाता है , तो यह चक्र टूट जाएगा । क्योंकि अगर एक आदमी दहेज के लालच में तीन जगह अपनी शादियां तोड़ चुका और चौथे , पांचवें और छठे जगह भी एक लड़की का पिता दहेज़ देने से मना कर देता है । तो लड़के की मजबूरी हो जाएगी बिना दहेज के विवाह करने की। क्योंकि अगर ऐसा नहीं किया उसने तो वह कुंवारा रह जायेगा।
          ऊपर की दोनों बातें सामाजिक स्तर पर थी। पर प्रशासनिक या कानूनी रूप से कहा जाए तो सरकार इसके लिए बकायदा एक सख्त कानून तैयार करें। और हर विवाह के बाद बारातियों के साथ जा रही ट्रक ,टैक्सी और पिकअप को चेक किया जाए । मुझे लगता है इन उपायों से दहेज पर काबू पाया जा सकता है ।
               बाल विवाह के लिए परिवारों को शिक्षित करना अति आवश्यक है। बहुत बड़े स्तर पर नहीं तो कम से कम उन्हें यह बताना आवश्यक है कि कम उम्र में विवाह करने पर एक लड़की को किस प्रकार की कठिन परिस्थितियों का सामना करना पड़ता है । शारीरिक समस्याओं का सामना करना पड़ता है । क्योंकि बाल विवाह के केस में ज्यादा परेशानियां चुकी लड़कियों को ही होती है । इसलिए लड़कियों के मां-बाप को आंगनवाड़ी ,सेविका ,आशा तथा प्राथमिक स्तर पर जो भी सरकारी संस्थाएं कार्यरत हैं उन्हें आगे बढ़कर अपने गांव अपने वार्ड में यह जागरुकता फैलाने होगी ।
इस तरह से मुझे लगता है की दहेज़ और बाल विवाह से निजात पाने का एक उपाय यह साबित हो सकता है।
Gunjan ki KALAM se

Monday, January 15, 2018

विपक्ष विहीन राजनीति की ओर, अग्रसर होता भारत।


अक्सर राजनीति एवं लोकतंत्र जैसे शब्द सुनने के साथ ही हमारे मन में जो पहली बात उठती है, वो है अलग-अलग राजनीतिक पार्टियां। मज़ा भी आता है इनके कारनामों की चर्चा करने में। पर राजनीति केवल व्यवहारिक नहीं होती इसके इतर एक राजनीति होती है, सैद्धांतिक राजनीति। वो राजनीति जो आज लुप्त हो चुकी है। लोकतंत्र इसी सैद्धांतिक राजनीति रूपी स्तंभ पर खड़ा है। कहते हैं राजनीति में दिशा और दशा सदैव एक समान नहीं रहती। विशेष रूप से भारत जैसे विशाल देश में। यहां राजनीति का स्वरूप सदैव बदलता रहता है और यह ज़रूरी भी है।
हम अगर लोकतंत्र के जन्म अथवा औचित्य पर विचार करेंगे तो यह पाएंगे कि लोकतंत्र का जन्म राजतंत्र अथवा तानाशाही शासन को समाप्त कर जनता द्वारा चुने नुमाइंदों को शासन या सेवा के लिए नियुक्त करने को हुआ था। पर लगता नहीं कि लोकतंत्र राजशाही का सफल विकल्प था। लोकतंत्र बिल्कुल जनता द्वारा चुने गए तानाशाहों की तरह कार्य कर रहा है।
शुरुआती असफलताओं से लड़ते हुए भारत ने अपना संविधान बनाया। उम्मीद थी कि यह लोकतंत्र एवं संविधान देश को विश्व पटल पर एक नई उम्मीद के साथ उभारेगा। पर वर्तमान स्थिति को देखा जाए तो यह एक चिंताजनक बिंदु है। आजादी के 70 साल बाद भी अगर देश में धार्मिक एवं जातिगत चुनाव, गोमांस, आजादी, मंदिर, हिंदूराष्ट्र अथवा वोट बैंक और घोटाले जैसे शब्दों एवं मुद्दों के आधार पर चुनाव हो रहे हैं या जीते जा रहे हैं तो निश्चित ही हम पतन की ओर जा रहे हैं।
इन सब के ऊपर जो मुद्दा सबसे चिंतित करने वाला है, वह यह है कि भारत जैसे विशाल लोकतंत्र में सत्ता पक्ष से अधिक जिम्मेदारी विपक्ष की है और कभी भी देश को एक मजबूत विपक्ष नहीं मिल सका। ऐसा विपक्ष जो अलग-अलग मुद्दों पर सरकार की नीतियों की निंदा कर सके और देशहित के मुद्दों पर सरकार का साथ दे।
अब अगर वर्तमान चुनावों की बात करें तो कांग्रेस या भाजपा कहीं भी अपने एजेंडे या एक सोच के साथ सत्ता में नहीं आई। बल्कि पिछली सत्ता के विकल्प के रूप में आई। जनता वर्तमान सरकारों से त्रस्त थी इसलिए विकल्प के तौर पर इन पार्टियों को सत्ता सौंपी गई। इन सब बातों में वह विपक्ष कहां है जो खुद को इन सरकारों की नीतियों से बेहतर साबित कर सके। वह विकल्प कहां है? जिस पर जनता विचार करे।
हिंदू वोट, मुस्लिम-यादव वोट, ओबीसी वोट बैंक, दलित वोट बैंक। क्या इन्ही मुद्दों के दम पर चुनाव लड़े एवं जीते जाएंगे? क्या चुनाव तक ही संविधान सीमित है? चाहे राष्ट्रीय स्तर पर यूपीए हो या बिहार में बीजेपी, मध्यप्रदेश में कांग्रेस हो, या यूपी में बीएसपी/एसपी। सभी विपक्षी पार्टियां चुनाव हारने के बाद, खुद को एक मजबूत विपक्ष के रूप में तैयार ना करके अगले चुनाव की तैयारियों में लग जाती हैं।
एक और विचार यूं ही आया, आपसे कह रहा हूं। वर्तमान में गठबंधन की सरकारों एवं साथ मिलकर चुनाव लड़ने की परंपरा खूब चली है। दिन प्रतिदिन यह स्थिति बढ़ ही रही है। बिहार में एक तरफ जेडीयू-आरजेडी-कांग्रेस एवं अन्य छोटी पार्टियां थी। तो दूसरी तरफ बीजेपी-एलजेपी-आरएलएसपी तथा अन्य छोटी पार्टियां थी। पर भविष्य में तब क्या हो, जब ये सभी पार्टियां अर्थात बीजेपी-एलजेपी-आरएलएसपी-जेडीयू-आरजेडी-कांग्रेस एवं अन्य पार्टियां भी आपस में शक्ति के हिसाब से सीटों का बंटवारा कर ले। सभी निर्विरोध चुनाव जीत जाएं। कोई चुनाव खर्च नहीं। कोई प्रचार नहीं। सुकून की सत्ता, सभी को सत्ता, कोई विपक्ष नहीं, जो करो सब सही।
हो सकता है आप में से कुछ लोग कहें कि यह संभव नहीं है। पर हुजूर ये राजनीति है। उम्मीद तो नीतीश-लालू के भी साथ आने की नहीं थी। उम्मीद तो एक वोट से बीजेपी की सरकार गिराने वाले रामविलास और बीजेपी के भी साथ आने की नहीं थी। ऐसी बहुत सी बातें, बहुत से समीकरण हैं ,जो यूं ही संभव हो जाते हैं राजनीति में। पर वो जो सबसे घातक है संविधान के लिए, लोकतंत्र के लिए, देश के लिए, हमारे लिए , तुम्हारे लिए, वह है विपक्ष विहीन लोकतंत्र की ओर अग्रसर होता भारत।

राष्ट्रगान पर मतभेद क्यों?


अभी 4 दिन पहले की बात है। मैं पटना गया हुआ था। दोस्त Amitav के साथ Jumanji देखने का प्लान बना। शहर के Cinepolis,PNM Mall,Patna में 4:30 बजे का शो मैंने बुक किया । लाइफ ऑफ पाई के बाद यह दूसरी फिल्म थी जिसे मैं 3D में देखने के लिए एक्साइटेड था।

 थिएटर गया पहले तो ढेर सारी एडवर्टाइजमेंट दिखे। हम दोनों एक दूसरे से बात करने में मशगूल थे। अचानक से हॉल में अनाउंसमेंट हुई , कृपया राष्ट्रगान के लिए खड़े हो जाएं । पर हम इसके लिए बिल्कुल भी तैयार नहीं थे । हम विराट और अनुष्का की शादी की बात कर रहे थे शायद । पर फिर भी अनाउंसमेंट हुई और लोग अचानक से खड़े हो गए । हम भी खड़े हुए । क्योंकि राष्ट्रगान की धुन जैसे ही कानों में पड़ी अचानक खड़े होने वाली आदत है ।

               पर यह राष्ट्रभक्ति कहीं से भी प्राकृतिक नहीं लग रही थी। बिल्कुल थोपी हुई और नकली राष्ट्र भक्ति प्रतीत हो रही थी। मैंने पुरे दिल से राष्ट्रगान तो गा दिया और उसके बाद मैंने कहा कि अब क्या भारत माता की जय और वंदे मातरम भी होगा । हम इंतजार ही कर रहे थे कि एक राष्ट्रभक्त ने उधर से भारत माता की जय के नारे भी लगा दिए। माहौल पूरा 15 अगस्त और 26 जनवरी वाला हो गया था।

                               यह सब काफी हास्यप्रद  लग रहा था। बहुत हंसी आ रही थी। पर हद तो तब हो गई जब 10 मिनट बाद ही फिल्म में हॉट पैंट पहने Madison Iseman की एंट्री होती है, और 10 मिनट पहले राष्ट्रगान में खड़ा आदमी पीछे से आवाज़ लगाता है । देख माल आ गई।

 यह दोनों ही चीजें बिल्कुल भी प्रासंगिक नहीं थी। एक दूसरे से दोनों का ही कोई संबंध नहीं था । पर मानसिकता की बात की जाए तो आप अंदाजा लगा सकते हैं कि लोग हॉल में क्यों जाते हैं । और राष्ट्रगान के क्या मायने हैं ।

                   इन दोनों के बाद सुप्रीम कोर्ट का फैसला अच्छा लग रहा है। हर किसी को अपने राष्ट्र का सम्मान, अपने राष्ट्र से प्रेम जरूर करना चाहिए। पर थोपी हुई किसी भी चीज के पक्ष में नहीं हूं मैं।

Gunjan ki KALAM se

Thursday, January 11, 2018

आत्महत्या, क्यों?

आत्महत्या से खत्म नहीं होती परेशानीयाँ,
खत्म हो जाता है एक शरीर ,
एक उम्मीद ,
आने वाली पीढ़ी ,
पिता की लाठी ,
मां का आंचल ,और
भाई बहन का साथ ।।

आत्महत्या से खत्म नहीं होती जिम्मेदारियां ,
खत्म हो जाती है तुम्हारी इज्जत,
तुम्हारा प्यार ,
तुम्हारी अहमियत ,और
तुम।।

तुमने आत्महत्या की ,
यानी तुम हार गए ,
तुम होते तो तुम्हें मैं मिलाता ,
उस लड़की से ,
जिसके हाथ नहीं थे ,
तुम होते तो तुम्हें मैं मिलाता,
उस बूढ़ी औरत से ,
कोई और जिसके साथ नहीं थे,
कलाकारी करती है वो लड़की,
अपने पैरों से ,
सब्जियां बेचती है वो बूढ़ी औरत ,
पर मांगती नहीं गैरों से

इन दोनों के अलावा भी ,
संघर्ष बहुत है ,
जीवन नाम ही है कठिनाइयों का ,
राह इसकी कठिन बहुत है ,

तुमने देखी बस परेशानियां अपनी,
काश कि तुम,
इस संघर्ष को भी देख पाते,
तुमने देखी बस बेबसी अपनी ,
काश कि तुम ,
जिंदगी की खूबसूरती को भी देख पाते,

जीवन है इक यात्रा ,
बुरा इसका अंजाम नहीं होता ,
याद रखो बस इतना ,
आत्महत्या कभी समाधान नहीं होता,
आत्महत्या कभी समाधान नहीं होता।

Wednesday, January 10, 2018

2जी प्रकरण पर आई राजा के लिए राहत।


#2g_scam
कोर्ट ,सीबीआई या फिर कोई और चाहे कुछ भी कह ले। पर मैं 2जी घोटाले को घोटाला समझता हूं। ठीक वैसे ही जैसे कोर्ट ,सीबीआई या फिर कोई और चाहे कुछ भी कह ले । गोधरा में मोदी की संलिप्तता और 84 के दंगों में राजीव गांधी की संलिप्तता मैं मानता हूं ।
                     पर यह बात सिर्फ किसी के दोषी या फिर किसी के निर्दोष साबित होने कि नहीं है। यह एक बहुत ही दूरगामी फैसला है । मेरे अनुसार यह एक सुनियोजित घटना है जिसका भारतीय राजनीति में भविष्य में एक अहम योगदान होगा।
         2015 में जयललिता के मुख्यमंत्री बनने के बाद तमिलनाडु में उनकी योग्यता को देखते हुए, उनके नेतृत्व को देखते हुए यह अंदाजा लगाना बिल्कुल आसान था कि आगामी 15-20 सालो तक कोई और पार्टी तमिलनाडु में कभी वापसी नही कर पाएगी । पर जिस प्रकार तमिलनाडु की राजनीति में वक्त ने करवट बदली। पहले जयललिता का जेल जाना, फिर उनकी तबीयत खराब होना और फिर उनकी संदेहास्पद मृत्यु । इन घटनाक्रमों ने तमिलनाडु को सालों पीछे लाकर खड़ा कर दिया । वहीं दूसरी तरफ विपक्ष की पार्टियों को पैर फैलाने के लिए चादर मिलती दिखाई देने लगी । वक्त बिल्कुल सटीक है जब एआईडीएमके अलग-अलग गुटों में बट चुका है । किसी खास व्यक्ति के नेतृत्व में कोई भी गुट आना नहीं चाहता। उस वक्त डीएमके के जैसी बड़ी विपक्ष की पार्टी के सामने उम्मीदों के दरवाजे खुल चुके हैं।
             इन्हीं घटनाक्रमों के बीच तमिलनाडु की राजनीति में कोसो पीछे चल रही भारतीय जनता पार्टी ने भी अपनी जमीन तलाशनी शुरू की है। ए राजा और कनिमोझी यह दो ऐसे नाम है जो डीएमके में एक बड़ा रुतबा रखते हैं। ए राजा का बरी होना कहीं ना कहीं भारतीय जनता पार्टी और डीएमके के पहले मिलन जैसा लगता है। एक और जहां डीएमके से बात की जाएगी वहीं दूसरी ओर चुनावी गठबंधन पर पुरजोर चर्चा होगी अगर बात बन गई तो फिर यह कोर्ट का फैसला माना जाएगा। जहां पर यह राजा को बाइज्जत बरी किया गया। और अगर बात नहीं बनती है तो सरकार सीबीआई के फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में अपील दायर कर सकती है। पर फिलहाल यह सभी पूर्वाभास है, इन पूर्वाग्रहों को कहां तक सत्यापित किया जाता है यह तो समय ही बताएगा। पर फिलहाल राजनीति इंजॉय कीजिए, क्योंकि सिद्धांत जैसा कुछ ढूंढने से भी नहीं मिलेगा इसमें।
Gunjan ki KALAM se

Sunday, January 7, 2018

सब ठीक जो जाएगा: कविता

सब ठीक हो जाएगा।(कविता)
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जब इमारते रंगीन हो रही हैं ,
और रिश्ते बेरंग हो रहे हैं,
जब अस्पतालों में किलकारियां ,
चीखों में तब्दील हो रही हैं,
जब हवा में खुशबू नहीं ,
डर फैल रहा है।
तब भी एक उम्मीद कायम है,
इंसान के इंसान बने रहने की,
उम्मीद कायम है ।
माघ की सर्दी में ,
रेलवे स्टेशनों के बगल की झुग्गियां ,
जब मन विचलित करती हैं।
झुग्गियों के अंदर दम तोड़ रही उम्मीदें,
जब मन विचलित करती हैं।
थाम लेता हूं बेचैन मन की डोर को,
क्योंकि यूं ही चुपचाप बैठा नहीं जाता।
हाथ पर हाथ धरे रहा नहीं जाता।
जी करता है काट लूं ,
दुनिया से खुद को ।
जला दूं अखबारों को,
बुझा दूं समाचारों को ।
उदास मन लेकर,
बैठ जाता हूं घर के इक कोने में।
फिर पापा को गाजर का हलवा बनाते देख ,
लगता है सब ठीक हो जाएगा।।।

Gunjan ki KALAM se

Tuesday, January 2, 2018

शांति


"ध्वनि की अनुपस्थिति ही शांति है।"
पर मेरे ख्याल से शांति की अपनी परिभाषा होनी चाहिए। स्वयं में संपूर्ण ब्रह्मांड समेटे इस शब्द को परिभाषित करना कठिन जरूर है, पर असंभव नहीं। मैंने कोशिश की, पर कोई सटीक , एक पंक्ति की परिभाषा देने में असफल रहा ।
              परिभाषा से इतर शांति के दो भेद हैं मुर्दा शांति और जिंदा शांति। दोनों ही एक दूसरे को विकर्षित करते हैं । यह आवश्यक नहीं कि दो लोगों के बीच की शांति सदैव जिंदा हो या सदैव मुर्दा हो। वक्त हालात और दूरियों के अनुसार यह परिवर्तित हो सकते हैं । और तो और एक व्यक्ति के मन मस्तिष्क के अंदर की शांति भी सदैव एक जैसी नहीं होती । मैं तो हर स्थान की शांति को विभाजित करता रहता हूं, कि आखिर यह जिंदा शांति है या मुर्दा शांति।
             अक्सर कहा गया है की शांति को प्राप्त कर लेना ही अंतिम लक्ष्य है। पर मुझे यह वाक्य अधूरा लगता है।" जिंदा शांति को प्राप्त कर लेना ही अंतिम लक्ष्य है" पूरा वाक्य होना था।
                           अगर कोई आपको अकेले रहने से रोक रहा है तो उससे दूरी बनाइए। क्योंकि अकेले होना साथ होने जितना ही आवश्यक है। लोगों के साथ होने जितना ही अपने साथ होना भी आवश्यक है । अपने अंदर की मुर्दा शांति को खत्म कर जिंदा शांति भरने के लिए अकेले होना आवश्यक है । अकेले होना आवश्यक है क्योंकि दूसरों का होने से पहले खुद का होना आवश्यक है । दूसरों से प्रेम से पहले खुद से प्रेम होना आवश्यक है ।
                   जहां चिड़ियों की चुहल के बीच पहाड़ों की शांति जिंदा शांति है ,वही मानवनिर्मित पार्कों की शांति मुर्दा प्रतीत होती है। गाँव की शांति जहां ज़िंदा करती हैं वही,  शहरो की शोर शराबे वाली शांति मुर्दा करती हैं।
हमे समझना होगा की चिंतन एवं मंथन दो अलग अलग चीज़े हैं। हमे मंथन करना होगा।
मानव को जीवित रहने के लिए, ज़िंदा शांति प्राप्त करनी ही होगी।
Gunjan ki KALAM se