Friday, November 2, 2018

क्या युद्ध शांति का पर्याय है?


युद्ध इस दुनिया की कभी ना खत्म होने वाली एक क्रिया है । युद्ध के भरोसे ही दुनिया के कई देशों की अर्थव्यवस्था चल रही है । क्योंकि भारत विश्व के सबसे बड़े बाजारों में से एक है इसलिए भारत विश्व के सबसे बड़े युद्ध क्षेत्रों में से भी एक है। इस देश में युद्ध कभी खत्म नहीं हो सकते क्योंकि भारत का खुला बाजार एक अड्डा बन गया है युद्धों पर पैसा लगाने का। कूटनीतिक रूप से भी भारत ने अमेरिका के इस कथन को शब्दशः अपना लिया है जो बीसवीं सदी में अमेरिका के सबसे मजबूत सिद्धांतों में से एक रहा है। सिद्धांत है कि "युद्ध शांति का पर्याय है"। 
शांति सिर्फ युद्ध के दम पर हासिल की जा सकती है।

* जैसा कि बीसवीं सदी के आरंभ से ही देखा गया कि कैसे विश्व युद्धों द्वारा दुनिया पर शांति थोपी गई।

* कैसे परमाणु बमों द्वारा जापान में शांति स्थापित की गई।

 *कैसे अपनी प्रतिष्ठा बचाने के लिए वियतनाम में अमेरिका ने शांति की कोशिशें जारी रखी।

 *फिर कैसे तेल के लालच में अमेरिका द्वारा इराक, ईरान तथा अन्य खाड़ी देशों में शांति स्थापित करने की कोशिशें जारी हैं।

* कैसे अफगानिस्तान में तालिबान की सफाई के ख्याल से बंदूक के दम पर शांति बहाल की जा रही है।


 शांति स्थापना के दो ही तरीके हैं । एक तो आप शांत हो जाएं और उनके कुकृत्यों में अपनी मौन स्वीकृति दे। तथा दूसरी है कि आप को जबरन गोलियों से शांत करा दिया जाए जहां शोर की कोई गुंजाइश ही नहीं होगी। दोनों ही परिस्थितियों में शांति के नाम पर सिर्फ मुर्दा शांति ही स्थापित की जा सकती है।

 वही मुर्दा शांति जो दशकों से भारत में भी बंदूक के दम पर स्थापित करने की कोशिश हो रही है। कश्मीर, नक्सल, पूर्वोत्तर , दक्षिण तथा पाकिस्तान एवं चीन से सटे इलाकों में ।

वैश्विक पटल पर देखें तो हम पाएंगे कि आतंकवाद या युद्ध के रूप में भारत के पास वैसी कोई विकराल परिस्थिति भी नहीं है ,जो इसे विश्व का सबसे बड़ा हथियार आयातक देश बना दे। पर यह सच है कि भारत विश्व का सबसे बड़ा हथियार आयातक देश है। और हथियार बेचने वाले ज्यादातर यूरोपीय, अमेरिकी, रूसी देश जानते हैं कि भारत के पास हथियार खरीदने के लिए पर्याप्त पैसे भी हैं और खपत करने के लिए पर्याप्त कारण भी ।
इस परिस्थिति को व्यापक ढंग से समझने के लिए हमें थोड़े आंकड़े खंगालने होंगे

अमेरिका, रूस, फ्रांस, जर्मनी, चीन तथा ब्रिटेन क्रमशः ये  विश्व के सबसे बड़े हथियार निर्यातक देश हैं। जिनका मुख्य पेशा है विश्व के दूसरे विकासशील देशों में युद्ध एवं विवाद के मुद्दों को जिंदा रखना, ताकि इनके द्वारा निर्मित महंगे हथियार लगातार बिकते रहे। विश्व बैंक तथा बड़े उद्यमी बढ़ चढ़ कर हथियारों की खरीद में हिस्सा लेते है।


 अमेरिका को विश्व भर में शांति स्थापित करने का सबसे बड़ा देश माना जाता है। पर पर्दे के पीछे की हकीकत यह है कि विश्व के सबसे बड़े हथियार बेचने वाले देशों में अमेरिका 34 फ़ीसदी हिस्सेदारी रखता है। विकसित और विकासशील देशों में हथियार खरीद का अनुपात 1:5 का है।  अर्थात विकसित देश जहां हथियारों पर ₹1 खर्च करते हैं वहीं विकासशील देश हथियारों पर ₹5 खर्च करते हैं । जबकि विकासशील देशों के मुख्य मुद्दों में अभी भी रोटी कपड़ा मकान और रोजगार होने चाहिए थे।


 कुल मिलाकर बात बस यही है कि औद्योगिक समूह, मीडिया, सरकार तथा अंतरराष्ट्रीय संगठन, कोई भी नहीं चाहता कि युद्ध समाप्त हो। क्योंकि अगर यह समाप्त हो गया तो उनकी दुकानें बंद हो जाएंगी। और ऐसा होता है तो यह एक सामूहिक हानि होगी। यह भी एक विडंबना ही है कि विश्व मे हथियारों की खरीद फ़रोख़्त एवं आंकड़ो के लिए जो संस्था काम करती है उसका नाम स्टॉकहोम अंतर्राष्ट्रीय शांति अनुसंधान संस्थान है। अर्थात एक शांति संगठन ही युध्द के आंकड़े रखता है।

 एक बात और जो हमें गांठ बांध लेनी होगी कि
" शांति कभी भी युद्ध की नींव पर नहीं स्थापित की जा सकती"

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Saturday, October 27, 2018

बस पूछना मत कि तेरे लिए हम क्या छोड़ आए हैं।(कविता)



बस पूछना मत कि तेरे लिए हम क्या छोड़ आए हैं।(कविता)
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मना लो खुशीयां  
कि हम हरम छोड़ आये है
पर जब भी इबादत में उठते है हाथ मेरे
याद आता है कि हम घर छोड़ आये है,

ये सूरज की किरणे हमे इसलिए चुभती हैं
कि लखनऊ की शामो को 
हम ढलता छोड़ आये हैं
एक जनाब से हमने कहा 
कि अब हमने बागों में टहलना छोड़ दिया है
वो हैरत से तकते रहे मुझे और पूछ बैठे 
की संगम का वो किनारा छूट गया
या आप खुद ही छोड़ आये हैं,

एक पतली सी सड़क 
जो जाती है मेरे घर से बनारस की ओर
बस उसके किसी मोड़ पर 
हम जीने की हसरत छोड़ आये है,
मेरी खुदगर्ज़ी का ये जज़्बा आज भी मुझे रुलाता है 
कि हम खुद को तो लाये हैं पर माँ को छोड़ आये हैं

जरूरतों को पूरा करने की जिद में याद आया एक दिन 
हमे पीतल तो मिल गया 
पर हम सोना छोड़ आये है
तसल्ली का मरहम हमे कभी मिला ही नही 
की हम खुद के बटोरे कंचों को 
किसी बन्द बोतल में छोड़ आये है 
गुजरे दिनों की यादें हमे इसलिए भी रुलाती है 
कि आंखों में हम किसी को सँवरता छोड़ आये हैं,

ये चाँद मुझसे आखिर रुठा क्यो रहता है 
शायद हम किसी के चेहरे का उगता सूरज छोड़ आये है
अब तो हँसी आती है अपनी मक्कारी पर हमको
बनते खुशमिज़ाज पर हम खुशियां छोड़ आये हैं,
वो सड़क आज भी बुलाती है हमे
जिसकी एक मोड़ पर हम इश्क़ अपना अधूरा छोड़ आये हैं,

कौन माफी देगा मुझे मेरे इन गुनाहों की 
हम जिस्म तो लाये पर अपनी रूह छोड़ आये हैं
लोगो ने कहा मुझसे
कि मजा लो इस महफ़िल का
अब उनसे कैसे कहें हम ये
कि अपनी महफ़िल हम किसी और दिल मे छोड़ आये है
वो राते जो खामोश थी किसी श्मशान सी
उन रातो में हम किन्ही जुल्फों का आँचल छोड़ आए हैं

उनके इंतेज़ार में थक चुकी है ये आंखे अब 
की हम इनमे ही उनको बसता हुआ छोड़ आये है
हमे अपनी मौत से पहले
 ये गुज़ारिश करनी है 
कि किसी को मत बताना कि हम जीते जी क्या छोड़ आये हैं।
साभार- शैलेश मिश्रा/अभिषेक नंदन

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Friday, October 26, 2018

आवाज़ उठाइये या खत्म होते देखिए इस धरती को।


न जाने क्यों ऐसा प्रतीत हो रहा है जैसे सरकार विरोध को एक विचारधारा की तरह चिन्हित किया जा रहा है। और ऐसा नहीं है कि केवल वर्तमान सरकार ऐसी कोशिशें कर रही हैं मुझे लगता है कि कोई भी सत्ता यह कभी बर्दाश्त नहीं कर सकती, कि शक्ति की सर्वोच्चता हासिल कर लेने के बावजूद चंद लोग उसकी आलोचना कर रहे हो।

 पर इन सब में जरूरी है सरकार, देश और मानव अस्तित्व में अंतर समझना। क्योंकि अक्सर यह देखा गया है कि सरकारे ऐसी भावनात्मक लहरे देश में उठा देती हैं, कि लोगों को लगने लगता है कि अगर कोई सरकार के साथ नहीं है तो वह देश के खिलाफ है। अगर कोई सरकारी नीतियों की आलोचना कर रहा है तो वह देश का विरोध कर रहा है ।
 पर ऐसा नहीं है ।

अगर कोई व्यक्ति सरकार द्वारा नोटबंदी में हुई फिजूलखर्ची और व्यवस्था के दुरुपयोग पर सवाल खड़ा कर रहा है तो इसका यह मतलब कतई नहीं है कि वह देश को कंगाल होते देखना चाहता है।

 अगर कोई व्यक्ति जम्मू और कश्मीर में 8% मतदान पर जनप्रतिनिधियों के चुने जाने का विरोध कर रहा है या अलगाववादियों की गोद में बैठ पाकिस्तान को गालियां देती सरकार का विरोध कर रहा है ,तो वह जम्मू कश्मीर विरोधी है ऐसा कतई नहीं है ।

अगर कोई व्यक्ति आरबीआई की नजरों के सामने बैंकों के अंधाधुंध कॉरपोरेट ऋण देते वक्त या एनपीए में अप्रत्याशित बढ़ोतरी होते वक्त सरकार के मूकदर्शक बने रहने का विरोध करता है, तो इसका यह मतलब कतई नहीं है कि वह राष्ट्र विरोधी है ।

हमें समझना होगा कि राष्ट्र केवल एक अवधारणा है, जिसके मूल ,जिसकी इकाई में जिंदा इंसान है । महंगाई, गरीबी, भ्रष्टाचार, भूखमरी, लोकतंत्र, चुनाव, अर्थव्यवस्था, न्यायपालिका, सरकार या फिर यह जमीन का टुकड़ा भी उसी जिंदा इंसान के इर्द-गिर्द घूमते रहते हैं। अतः यह आवश्यक है कि सरकार के हर फैसले को प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से उस अंतिम जिंदा इंसान से जोड़कर देखा जाए और फिर उसकी समीक्षा की जाए ।

सरकार महज एक अस्थाई व्यवस्था है जिसमें कुछ लोगों को लोगों द्वारा चुनकर लोगों के लिए काम करने हेतु नियुक्त किया जाता है। ये लोग, ये चुनाव सही भी हो सकते हैं और गलत भी। पर इसे देश की प्रतिष्ठा या अस्तित्व से कभी नहीं जोड़ा जा सकता।

 सही को सही और गलत को गलत कहने की क्षमता देश के हर व्यक्ति में होना आवश्यक है। साथ ही सही और गलत को उसकी वास्तविकता बताने का निष्पक्ष ज्ञान होना भी उतनी ही जिम्मेदारी का सबब है। जिसका सबसे बेहतर उदाहरण अमरीकी-वियतनाम युद्ध में देखने को मिलता है । जब अमेरिका की वियतनाम चढ़ाई का अमेरिका वासियों( खासकर लेखक, पत्रकार, साहित्यकार, कलाकार समूह ) ने पुरजोर विरोध किया था।

उन्होंने कृत्रिम सीमाओं को लांघ कर उस नैतिकता का पालन किया जो राष्ट्र, सरकार, सीमा या स्वार्थ हर किसी से ऊपर है।

अब जरूरत है ऐसा साहस हर देश, हर कस्बे, हर मोहल्ले के लोगों को दिखाने की। कई ऐसे युद्ध, ऐसे कृत्य, ऐसे फैसले अभी बाकी हैं जिनका दमन करना, जिनका विरोध होना अभी भी बाकी है।

क्योंकि अगर ऐसा नहीं किया गया तो यह एक मानवीय अनैतिकता होगी , और
इस अनैतिक समाज का खत्म हो जाना ही बेहतर होगा।

Gunjan ki KALAM se

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Saturday, May 12, 2018

एक वक़्त शिक्षा का केंद्र रहा बिहार, अब अनपढ़ है।

आर्टिकल से पहले कुछ क्विक फैक्ट्स।
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* बिहार भारत का सबसे अनपढ़ राज्य है, 61.8 फ़ीसदी साक्षरता दर के साथ यह भारत की साक्षरता दर 74% से काफी पीछे हैं।
* प्रथम कक्षा में नामांकन लिए हुए बच्चों में से केवल 38 फ़ीसदी छात्र दसवीं तक पहुंच पाते हैं।
*  प्राथमिक शिक्षा में जहां पूरे भारत में शिक्षकों एवं छात्रों का अनुपात  23:1 होना चाहिए, वही बिहार में यह अनुपात 36:1 का है।
* 2014-15 में हिमाचल प्रदेश सरकार द्वारा अपने हर छात्र पर 39,345 रुपए खर्च किए गए। यह खर्च विद्यार्थियों की शिक्षा , भोजन एवं शिक्षण सामग्री के लिए किया गया था। जबकि बिहार सरकार द्वारा अपने हर छात्र पर उसी वर्ष मात्र 5,258 रुपए खर्च किए गए।
* 2014 तक बिहार में केवल 58% विद्यालयों में लड़के एवं लड़कियों के लिए अलग-अलग शौचालय की व्यवस्था थी।
* मिहर में प्रति लाख बच्चों पर केवल 6 कॉलेज हैं, जबकि राष्ट्रीय औसत प्रति लाख छात्रों पर 26 कॉलेज का है।
                इन बिंदुओं के बाद भी बिहार में अगर सबसे सुखद, आसान और सर्वाधिक मांग वाली कोई नौकरी है तो वह है शिक्षक की। साथ ही साथ अगर सबसे कष्टकारी और मुश्किल कोई नौकरी है तो वह भी शिक्षक की ही है। पर आप सोच रहे होंगे कि एक ही वक्त में यह दोनों कैसे संभव है। बिल्कुल संभव है बस समझने की बात है।
            बिहार में B.Ed तथा डी.एल.एड जैसे कोर्सों की बढ़ रही मांग इस बात की पुष्टि करती है, कि यहां के छात्रों में रेलवे, SSC तथा अन्य प्रतियोगी परीक्षाओं में जाने की अपेक्षा, शिक्षण कोर्स करने की होड़ ज्यादा मची है। इसका अंदाजा आप इस बात से भी लगा सकते हैं कि डी.एल.एड कोर्स में नामांकन हेतु हर कॉलेज या संस्थान में लाखों की संख्या में आवेदन पहुंच रहे हैं ।क्योंकि छात्रों को उम्मीद है कि शिक्षक प्रशिक्षण की डिग्री एक बार मिल जाने पर टी.ई.टी परीक्षा पास कर एक शिक्षक बनने में कोई परेशानी नहीं होगी। टी.ई.टी की परीक्षा का आलम यह है कि कई सारे ऐसे गिरोह सक्रिय हैं जो लाख -दो लाख लेकर अभ्यर्थी के स्थान पर किसी और को परीक्षा दिलवाते हैं तथा टीईटी परीक्षा उत्तीर्ण करवाने की गारंटी लेते हैं।
          साथ ही साथ YouTube पर ऐसे कई सारे वीडियो मिल जाएंगे जिनमें बिहार के शिक्षकों की पोल खुलती नजर आएगी। वो शिक्षक जिन्हें सही से जनवरी-फरवरी की स्पेलिंग भी नहीं पता है उनपर बिहार के बच्चों का भविष्य सुधारने की जिम्मेदारी है। वर्ष 2013 14 में नीतीश सरकार ने एक फरमान जारी किया कि वह शिक्षक जो फर्जी रूप से विद्यालयों में शिक्षक के रूप में भर्ती हुए हैं। वो स्वतः शिक्षक से पद से त्यागपत्र दे दें। अन्यथा कानूनी कार्रवाई के तहत उन्हें दंडित किया जाएगा । इस फरमान के बाद हजारों की संख्या में शिक्षकों ने त्यागपत्र दिया। यह भी इस बात की पुष्टि करती है कि किस प्रकार से बिहार में शिक्षा माफिया सक्रिय हैं।
             यह तो बात हुई शिक्षकों के एक पक्ष की , वहीं अगर दूसरे पक्ष की बात की जाए तो यह शिक्षक बिहार में केवल शिक्षा के लिए उत्तरदाई नहीं है। बिहार में होने वाली हर सरकारी योजना, घटना एवं कार्यक्रमों की जिम्मेदारी इनपर होती है। शौचालय योजना के आंकड़े एकत्रित करने से लेकर चुनाव प्रक्रिया में भाग लेना, वोटर ID कार्ड बनवाने से लेकर मध्यान्ह भोजन को देखना, किताबें बांटने से लेकर स्वच्छाग्रही बनना। यह सारे कार्य शिक्षकों के मत्थे है। तथा इन कार्यों के लिए इन शिक्षकों को 6000-12000 रूपए प्रतिमाह दिए जाते हैं । क्योंकि इन शिक्षकों को परमानेंट शिक्षक नहीं बल्कि कॉन्ट्रैक्ट शिक्षक कहा जाता है। समान काम के लिए समान वेतन हेतु इन शिक्षकों ने सालों से कई आंदोलन किए, धरना प्रदर्शन किए। अंततः उन्होंने सरकार पर कानूनी कार्यवाई तक की । जिसके जवाब में सुप्रीम कोर्ट ने निर्णय लिया कि जब शिक्षक दूसरे परमानेंट शिक्षकों के बराबर ही काम करते हैं तो आखिर इन्हें वेतन समान क्यों नहीं मिलता । माननीय सुप्रीम कोर्ट ने बिहार सरकार को आदेश दिया है एक समुचित योजना के तहत सभी शिक्षकों को बराबर वेतन दिया जाए । जिसके बाद सरकार की आंखें खुली और उसे अतिरिक्त वित्तीय बोझ झेलना न पड़े इस हेतु सरकार ने अपनी आंतरिक कार्रवाई तेज कर दी। तथा कई माध्यमों से कम से कम शिक्षक भर्ती करने की योजना बनाई।
उसके बावजूद सरकार की विफलता बताने के लिए यहाँ के रोजगार की स्थिति काफी है। सरकारी परीक्षाओं के नाम पर बिहार सरकार BPSC, BSSC परीक्षाएं आयोजित करती है। पर हाल यह है कि BPSC का अकादमिक वर्ष करीब 5 वर्ष पीछे चल रहा है । जबकि बिहार BSSC अपनी एक परीक्षा इन 4 वर्षों में भी पूरी नहीं कर सका है। अतः प्रतियोगिता के माध्यम से जो परीक्षार्थी बिहार सरकार में नौकरी पाना चाहते हैं ,वो हताश हो चुके हैं। केवल और केवल निराशा नजर आ रही है। बिहार सरकार नौकरियां उत्पन्न करने के नाम पर अलग-अलग सरकारी योजनाएं निकालती हैं, स्टूडेंट क्रेडिट कार्ड, बिहार कौशल विकास योजना इत्यादि। परंतु सरकार के पास वास्तविक नौकरियां बिल्कुल भी नहीं हैं। सरकार को विद्यार्थियों के हित में या चुनाव के लालच में ही सही , इस सन्दर्भ में योजनाबद्ध तरीके से कार्य करना चाहिए, वरना सरकार को याद रखना चाहिए की यह जननायक की भूमि है, क्रांति यहाँ खून में बसती है। बस धैर्य का बाँध न टूटे।
जय बिहार।

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Wednesday, April 25, 2018

नीतीशे कुमार हो??


फिर से एक बार हो ,बिहार में बहार हो ।
फिर से एक बार हो, नितीशे कुमार हो।
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   2015 में मधेपुरा के Raj Shekhar  ने नीतीश कुमार के चुनावी कैंपेन के लिए जब यह गाना लिखा होगा। तो कभी नहीं सोचा होगा कि आने वाले 4 या 5 सालों में हालात ऐसे हो जाएंगे। स्थिति क्या है बिहार की इस पर बहुत ज्यादा बताने की आवश्यकता नहीं है। बहुतों को इसके बारे में जानकारी होगी। पर जमीनी हकीकत से सिर्फ वही लोग रूबरू हैं जो इसकी मार झेल रहे हैं।
                 अभी ताजा तरीन उदाहरण के रूप में अगर बात की जाए ,तो नीति आयोग के सीईओ अमिताभ कांत ने माननीय सुशासन बाबू की पीठ थपथपाई है , और यह बताया है कि भारत के विकास में कुछ चंद राज्य बाधा पैदा कर रहे हैं उन राज्यों में फिर से वही नाम है जो हमेशा से होते हैं । "बीमारू राज्य" , बिहार ,मध्य प्रदेश, राजस्थान, उत्तर प्रदेश और एक नया नाम जुड़ा है, वह है छत्तीसगढ़ ।
         
               क्योंकि मैं बिहार का बाशिंदा हूं, इसलिए मुख्य रूप से मैं बिहार की बात करूंगा। 2005 में जंगलराज के खत्म होने के साथ ही बिहार ने सत्ता परिवर्तन के रूप में एक नया संकल्प लिया था और नीतीश कुमार ने NDA के साथ मिलकर लोगों को यह वादा किया था कि बिहार जंगलराज के अंधेरे से बाहर निकल के एक नए सवेरे की तरफ अग्रसर होगा। पर आज जब मैं उस वादे को याद करता हूं तो वो समुद्र के किनारे रेत के टीले जैसा लगता है । जिन मुद्दों पर नीतीश कुमार बिहार में एक पोस्टर बॉय की तरह याद किए जाने लगे, उन मुद्दों में सबसे प्रमुख मुद्दा है बिहार को विशेष राज्य का दर्जा दिलाने का मुद्दा । वह मुद्दा जिस पर व्यापक रूप से हस्ताक्षर अभियान तक चलाए गए, बड़ी-बड़ी जनसभाएं हुई । पर पता नहीं क्यों वर्तमान समय में वह मात्र राजनीति का एक रुप लगता है। क्योंकि केंद्र में कांग्रेस शासित यूपीए की सरकार थी तो एनडीए तथा उसके घटक दल जेडीयू के मुखिया नीतीश कुमार ने बढ़-चढ़कर बिहार को विशेष राज्य दर्जे की मांग की थी। और अगर गौर करें तो पिछले 4 सालों से केंद्र में बीजेपी की सरकार होने के बावजूद नीतीश कुमार ने इस प्रकार के किसी भी कैंपेन में हिस्सा नहीं लिया।
                 ऊपर लिखे राज्यों में कई सालों से बीजेपी की सरकारें हैं या फिर कुछ राज्यों में सत्ता का परिवर्तन होता रहता है । परंतु अगर एक सामान्य नागरिक के दृष्टिकोण से देखें तो आप पाएंगे कि सदैव आप ही ठगे जाते हैं । आप को बीजेपी और कांग्रेस के मुद्दों पर भटकाया जाता है और वास्तविक मुद्दों को गौण कर दिया जाता है । शायद आपने कभी गौर भी नहीं किया होगा कि बिहार में हर साल बाढ़ आती है और अगर यह मान लिया जाए कि जंगलराज में कुछ भी नहीं हुआ तो फिर आखिर इन 12 सालों में नीतीश कुमार ने क्या किया बाढ़ को लेकर।  बाढ़ अभी भी हर वर्ष आती है। लाखो-लाख वर्ग हे० की जमीनों को बंजर करती है , लाखों लोग बाढ़ में विस्थापित होते हैं और हर साल एक नए सिरे से अपनी जिंदगी की शुरुआत करते हैं ,इस इंतजार में कि अगले साल फिर बाढ़ आएगी और उन्हें फिर से विस्थापित होना होगा।
        अगर हम शिक्षा की बात करें तो शिक्षा और शिक्षक दोनों ही बिहार में बदहाली की स्थिति में जी रहे हैं। शिक्षक जहां शिक्षा को छोड़कर दुनिया जहां के हर कार्य करने में तुले हुए हैं । फिर चाहे वह शौचालय योजना की समीक्षा हो या मुख्यमंत्री सात निश्चय योजना की समीक्षा या फिर विद्यालयों में चलने वाले मध्यान भोजन की देखरेख उन्हें समय-समय पर चुनाव कार्यों में भी लगाया जाता है, और आए दिन वह अपने मुद्दों को लेकर लगातार प्रदर्शन करता भी दिखता रहता है। परंतु इन सबके बीच शिक्षा कहां है? आने वाला भविष्य कहां है?
           चूंकि बिहार जैसे छोटे छोटे राज्य ही मिलकर भारत का निर्माण करते हैं । और अगर आप की नींव बिहार जैसी है तो फिर आपका घर भी उत्तर प्रदेश से बेहतर नहीं बन सकता ।
                  अगर राष्ट्रीय स्तर पर बात की जाए तो मानव विकास सूचकांक जारी करने वाली एक संस्था के अनुसार, भारत 188 देशों की सूची में 131 वें पायदान पर आता है । इस आंकड़े को देखने के बाद भी अगर आपके मन में इस बात की एक झूठी उम्मीद है कि आप एक विश्व शक्ति बनकर उभर रहे हैं। तो निश्चित ही आप दिवास्वप्न देख रहे हैं , जिसमें बिल्कुल भी सच्चाई नहीं है। भारत अपने प्राथमिक मुद्दों को छोड़कर उन मुद्दों पर चल पड़ा है जिससे उसे वोट तो मिल सकता है नोट तो मिल सकता है पर भविष्य नहीं मिल सकता ।
            आप नारी सुरक्षा में पिछड़ चुके हैं , आप शिक्षा, उच्च शिक्षा में पिछड़ चुके हैं । आप शिशु मृत्यु दर में पिछड़ चुके हैं ,आप युवाओं को रोजगार देने में पिछड़ चुके हैं। उसके बाद भी आप दम्भ भरते हैं कि हम एक नए भारत का निर्माण करेंगे तो यह बात पचती नहीं है।
                    बहरहाल नीतीश कुमार ने अब तक अपनी छवि , एक कुशल सुशासक के रूप में बनाई हुई है । परंतु इस छवि का क्या उपयोग जब लोगों को लगातार मूलभूत सुविधाएं प्राप्त नहीं हो रही है । शौचालयों की स्थिति पर मैंने इससे पहले भी बात की थी कि बिहार सरकार जो ₹12000 शौचालय मद में देती है, उसमें ₹6000 मुखिया और वार्ड सदस्य अपने हिस्से में ले लेते हैं (सभी नही पर ज्यादातर पंचायतों में यही स्थिति है)।  अंततः एक नागरिक के पास ₹6000 ही मिलते हैं जिसमें उसे शौचालय का निर्माण कराना होता है। क्योंकि यह राशि कम पड़ जाती है इसलिए वो शौचालय नहीं बनवा पाता, और खुले में शौच करना ही उसकी मजबूरी हो जाती है।
                    आपको यह देखना होगा कि आप की जनसंख्या आपके लिए एक संभावना है या फिर एक चुनौती । आने वाले समय में कहीं ऐसा ना हो जाए कि आप की जनसंख्या आप पर बोझ बन जाए और जनसंख्या विस्फोट में आप दब जाएं । लोग भले ही नीतीश कुमार को एक कुशल प्रशासक कहें परंतु मेरी नजर में उनका सुशासन केवल ऊपरी और दिखावे का है। आपके राज्य में एक सांसद का बेटा शराब पीते हुए पकड़ा जाता है और शराबबंदी को ठेंगा दिखाते हुए समाज में आज़ाद घूमता है ।आप के राज में एक केंद्रीय मंत्री का बेटा दंगों का मुख्य आरोपी होता है और आपकी पुलिस उसे पकड़ने में नाकामयाब रहती है।
                साथ ही जनसेवा एक्सप्रेस की भीड़ यह बताने के लिए काफी है कि आपने पलायन को भी एक प्रमुख समस्या नहीं समझा। और यहां के मजदूर या निम्न वर्ग के लोग अभी भी अपनी कमाई के साधन के लिए दिल्ली पंजाब जाना ही कुबूल करते हैं । क्या यह आप की विफलता नहीं कि आपके राज्य के लोग किसी दूसरे राज्य में जाकर अपने जीविकोपार्जन हेतु अपने परिवार से दूर होते हैं । उसके बाद भी आप दम्भ भरते हैं , क्या आपने एक नए बिहार का निर्माण किया है ? कहां है वह नया बिहार ?
                      मुझे दिखाइए, मुझे कोई भी एक विभाग बताइए जहां आपने सौ प्रतिशत कार्य किए हो, आप कहेंगे कि मुझे सिर्फ नकारात्मकता दिखती है। नहीं मुझे वह छोटू जैसा लड़का भी दिखता है जो किसी चाय दुकान पर दिन के ₹200 के लिए ग्लास धोता है, मुझे वह बच्चा भी दिखता है जो पीठ पर प्लास्टिक की बोरियां लादे उसमें कूड़ा बीनता है , प्लास्टिक की बोतलें बीनता है। ताकि कचरे वाले को देकर उसे ₹50-100 मिल सके। मुझे कुछ वैसे बच्चे भी देखते हैं जो पॉलिथीन में सन फिक्स सूंघकर अपना भविष्य बर्बाद कर रहे हैं । आप मुखिया हैं, यह आपकी जिम्मेदारी है। या फिर जो भी आपके नौकरशाह हैं उनकी जिम्मेदारी है। आप इन्हें पूरा कीजिए वरना बिहार के इस वक्त को भी दूसरे जंगलराज के रूप में याद करने में समय नहीं लगेगा।
Gunjan ki KALAM se

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Tuesday, February 13, 2018

शुक्रिया प्रिया


"सुनो मैं मंदिर जा रही हूं, तुम पानी की टंकी बंद कर देना और नाश्ता कर लेना।" - मम्मी ने मुझे कहा।
मैं भी रोज की तरह सुबह की जिम के बाद अपने फोन में बिजी था। यह भी एक आम दिन ही था।
                 तभी अचानक Facebook पर मैंने अपनी टाइमलाइन में एक वीडियो देखा। जिसके थंबनेल में कुछ लड़कियां स्कूल यूनिफॉर्म में थी। मैं अमूमन Facebook के वीडियो नहीं देखता। पर चुकी ये स्कूल के टाइम का था, तो मैं इसे मिस नहीं कर सकता था। मैंने वह वीडियो चलाया ।वीडियो को पूरा देखने के बाद मैं सन्न रह गया । कान गर्म , आंखें सामान्य से ज्यादा खुली हुई । पिछले 3 मिनट में एक भी बार पलकें झपकाए बिना मैंने वह वीडियो लगातार , बार बार देखा। मैंने फिर रिवाइंड किया।
                 लड़का बाई भौं दो बार ऊपर करके लड़की की तरफ इशारा करता है। लड़का बेचारा मासूम है , नादान है। उसे अंदाजा भी नहीं है कि वह किस मुसीबत में फंसने वाला है । लड़की ईट का जवाब पत्थर से देती है। पहले अपनी बाई और फिर दाई भौंहे उठाकर। लड़का भन्ना जाता है । लड़के के पास और कोई शस्त्र नहीं है। उस हमले के जवाब में, जवाबी कार्रवाई के रूप में लड़का ,लड़की के हथियार का ही उपयोग करता है । और पहले अपनी दाई बाई भौहें उचका देता है । लड़के को गलतफहमी होती है कि वो जीत गया ।
                पर पिक्चर अभी बाकी है मेरे दोस्त यहां होती है लड़के के साथ बेईमानी। लड़की ब्रह्मास्त्र इस्तेमाल कर देती है। पूरे बालों को बाएं कंधे पर समेटे। जिसमें दाईं तरफ पूरे काले बाल तथा बाएं तरफ हल्के भूरे बाल सिमटे हुए नजर आते थे। जो एकाध बाल बिखरे हुए थे, वो यूं ही नहीं बिखरे हुए थे । बल्कि उन्हें बिखरना ही था। इतिहास बनने के लिए।
                     सुनहरे चेहरे पर काली भौहों के नीचे, सुरमई आंखों ने (हो सकता है वो काजल भी हो) तैयारी कर ली थी।आंखों के ऊपर तथा निचली पलकों का मिलन स्थल इतना खूबसूरत कभी नहीं लगा।
                    पर लड़का इन चीजों से अंजान था। जब तक वो बचाव की तैयारी करता। वार हो चुका था। बाईं आंख ने बंद होकर तथा दाएं भौंह ने साथ-साथ ऊपर उठकर , लड़के के पास कोई उपाय नहीं छोड़ा था। सिवाय हार स्वीकारने के।
                  लड़का मूर्छित होकर अपने दोस्त के कंधे पर जा गिरा । निशाना ठीक वही लगा यहां वह लड़की निशाना लगाना चाहती थी। और यह पूरा वाकया 13 सेकेंड के अंदर घटा । इतनी जल्दी अमेरिका का परमाणु बम उत्तर कोरिया को तबाह भी नही कर सकता था। ना शनि की छाया किसी व्यक्ति पर पढ़ सकती थी।
                  पर लड़का तो हंसे ही जा रहा है। आखिर वह हंस क्यों रहा है ? क्या उसे यह हार ही चाहिए थी ? क्या वह आंखों के निशाने से घायल होना ही चाह रहा था?
                खैर, जो भी हो । अब तक लड़का तथा लड़की से संबोधन इसलिए कर रहा था क्योंकि मुझे उनका नाम नहीं पता था। पर अब पता है । 
जो लड़की है , वह है प्रिया प्रकाश वेरियर।
और जो लड़का है, वह है रोशन अब्दुल रहूफ।
                  इन दोनों ने दुनिया को कई साल पीछे धकेल दिया है । आगे हो सकता है इन दोनों को इसकी कीमत भी चुकानी पड़े। क्योंकि जो नफरत का बीज इंसानियत ने दर्शकों की मेहनत से बोया था । मोहब्बत के खिलाफ जो सैकड़ों संगठन तैयार हुए थे। उन सब की दुकानों को बड़ा घाटा लगाया है इन दोनों ने। खासकर प्रिया ने।
              मैं तो शुक्रिया कहना चाहूंगा प्रिया को। वह सचमुच की वारियर है। उसने एक भयानक युद्ध को प्यार की एक आंख मार कर जीत लिया । शुक्रिया कहने के कई सारे कारण है । जैसे प्रिया ने यह खुलासा कर दिया कि लड़कों के दिल में अब भी 'गेम ऑफ थ्रोंस' और Clash of Clans के अलावा धड़कन बची हुई है । जो धड़कती भी है तथा तड़पती भी है । धड़कती है अपने यार के लिए, तड़पती है उनके प्यार के लिए । सख्त लौंडे बनने की ट्रेंड को प्रिया ने मोम की तरह पिघला दिया । शुक्रिया यह बताने के लिए कि लड़कों के पास प्यार वाला हार्मोन अभी बाकी है। लड़के अब भी नजरों तथा इशारों के शिकार हो सकते हैं । 
                 एक बात और क्लियर कर दी तुमने , वो ये कि प्यार की भाषा नहीं होती । वरना कैसे एक हिंदी बहुल देश में एक मलयाली गाना यू वायरल होता। और प्रिया प्रकाश के फॉलोअर्स 24 घंटे में 3000000 के पार हो जाते ।
                            बहरहाल उन लोगों को जिंदा करने के लिए शुक्रिया। हवा में प्यार घोलने के लिए शुक्रिया।
" मोहब्बत जिंदाबाद, जिंदाबाद, जिंदाबाद।
 " हां मैं नाश्ता करना भी भूल गया था और पानी की टंकी बंद करना भी।
"तुम भी ना प्रिया गजब हो"

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Wednesday, January 24, 2018

मैं बिहार


अब बात ज़ुबां पर आई है,
तुम सुनना ज़रा सा गौर से,
अब शुरू हुई पुरवाई है ,
तुम चलना ज़रा सा गौर से,
एक लड़का है उखड़ा-उखड़ा,
तुम सब के झूठे प्यार से,
एक लड़का है सहमा-सहमा,
वो शायद है 'बिहार' से,
ये गलती है उसने जो की,
वो आया दूजे राज्य से,
डरपोक नहीं वो चिंतित है,
बढ़ते भारत के भाग्य से,
एक मंच मिला मेरी ही तरह,
तो उसने शुरू कहानी की,
हर बिहारी के दुख दर्द को,
उसने अपनी जुबानी दी,
फिर शुरू हुआ एक शोषित का,
शोषण से भरा माफीनामा,
फिर शुरू हुआ इतिहास का,
गौरवशाली कीर्तिनामा ,
तुम्हें शून्य मिला उस शून्य का,
जन्मदाता एक बिहारी है,
हुआ लोकतंत्र का जन्म जहां,
वैशाली वो बिहारी है,
अशोक चंद्रगुप्त और न जाने कितने,
वीरों का खून बिहारी है,
हुई शिक्षा की शुरुआत जहां,
वो नालंदा बिहारी है,
हैं अतिथि जहां देवो भवः,
वह महाराष्ट्र नहीं बिहार है,
जहां युद्ध करो तो सुई नहीं,
मोहब्बत में हाज़िर जान है,
सरहद पर बेटों के बेटे,
और पीढ़ियां भी कुर्बान है,
उस पुण्य भूमि का बेटा हूं मैं,
यही मेरी पहचान है,
'बिहारी' गाली नहीं एक ओहदा है,
ये मेरा गुरुर, यही मेरा अभिमान है,
ये मेरा गुरुर, यही मेरा अभिमान है।।

मेरी कल्पना: तुम


सच और झूठ,
मैं दोनों बोलता हूं,
मुझे दोनों ही चाहिए।
दोनों ही पूरक है एक-दूजे के,
जैसे चीर देता है प्रकाश ,अंधेरे को
पर सोते वक्त चाहिए होता है अंधकार तुम्हें,
जैसे हर वक्त अंधकार बुरा नहीं होता ,
बस वैसे हर वक़्त प्रकाश ठीक नही होता,
काल्पनिक होना, न होने के बराबर मान लेते हैं लोग,
ये गलत है,
क्योकि कल्पना, वास्तविकता का ही तो पूरक है,
जैसे सोचोगे नही, तो करोगे कैसे?
करोगे नही, तो होगा कैसे?
हुआ नही तो वास्तविकता भी नही।
अतः कल्पना ही आधार है वास्तविकता का।
प्रेम ही आधार है जीवन का।
जैसे काल्पनिक है मेरा प्रेम,
और वास्तविक हो , बस तुम।
Gunjan ki kalam se

Sunday, January 21, 2018

दहेज़ और बाल विवाह से निजात पाने के कारगर उपाय।


कल बिहार में बाल विवाह और दहेज प्रथा के उन्मूलन हेतु ,भव्य मानव श्रृंखला बनाने की कोशिश की गई थी। मुझे पता नहीं है कोशिश कितनी सफल या असफल हुई। क्योंकि मानव श्रृंखला को सफल या असफल मानने का कोई बराबर पैमाना नहीं था । जहां पक्ष के लोग इसे भारी सफल मान रहे है। वही विपक्ष के लोग इसे बिल्कुल ही असफल मान रहे हैं।
                   पर मुझे इन दोनों से ही कोई मतलब नहीं। क्योंकि सफलता या असफलता हमेशा धरातल पर दिखती है। जमीनी स्तर पर योजनाएं या फिर आपके संकल्प कितने सच साबित हुए सफलता या असफलता की गारंटी मानी जाती है ।
                कल का दिन मेरे लिए एक सामान्य दिनों की तरह ही था। मैं लाइन में लगकर दिखावे के संकल्प में भाग लेना नहीं चाहता था। और ना ही लाइन से बाहर आकर दहेज प्रथा और बाल विवाह को समर्थन देना चाहता था । हां एक खुशी जरूर हुई कि सरकार ने इस क्रम में एक सकारात्मक पहल की है। सामाजिक स्तर पर लोग बाल विवाह और दहेज प्रथा के बारे में बात करने लगे हैं। क्योंकि जिस प्रकार से सामाजिक बुराइयां सामाजिक मान्यताओं की जगह ले रही हैं, वो दिन दूर नहीं जब हत्या , अपहरण , रेप जैसी घटनाएं सामाजिक बुराइयों की जगह सामाजिक मान्यताओं का दर्जा प्राप्त कर लें।
              क्योंकि जब ये घटनाएं घटित होती है तो जिनके साथ ये होता है उनको छोड़कर अन्य किसी भी वर्ग पर इसका प्रभाव नहीं पड़ता।
                            कल भी मैं तटस्थ रहने की कोशिश कर रहा था । घर के पास की दुकान पर कुछ लोग खड़े थे। मैं भी वही बगल में खड़ा था। दुकान वाले भैया मेरे जान पहचान के थे। इसलिए उन्होंने कहा मानव श्रृंखला में सम्मिलित नहीं होंगे क्या? दुकान पर ही खड़े एक व्यक्ति ने दुकान वाले भैया से कहा- लगता है भाई जी दहेज लेकर ही शादी करेंगे। शायद उन्होंने एक व्यंग कसा था।  पर फिर भी मुझे इसका जवाब देना जरूरी लगा।
                        सबसे पहले मैंने उनका परिचय लिया। तो वह पास के ही किसी गांव के मध्य विद्यालय के मध्यान भोजन प्रभारी सह शिक्षक थे। मैंने उनसे कहा कि आपको क्या लगता है यहां जितने भी लोग हैं इस मानव श्रृंखला में वह कौन है ? उन्होंने जवाब दिया कि यह सारे लोग दहेज और बाल विवाह के खिलाफ संकल्पित होने के लिए क्या एकत्रित हुए हैं । मैंने कहा- नहीं ,मुझे ऐसा नहीं लगता । मुझे इसमें सिर्फ दो किस्म के लोग ही नजर आते हैं । पहले वो जिन्होंने दहेज लेकर ही विवाह किया है । और दूसरे वो दहेज़ क्या है? इसके बारे में कुछ पता ही नहीं है।
     
                   फिर मैंने उन्हें 1 साल पहले की बात याद दिलाते हुए उनसे पूछा कि आज से 1 साल पहले भी शराबबंदी के खिलाफ लोग यूं ही मानव श्रृंखला बनाकर एकत्रित हुए थे । मैं भी उसमें सम्मिलित हुआ था। मुझे आप बताइए कि उसके क्या फायदे हुए। उन्होंने बताया कि सरकार ने शराबबंदी के लिए एक बेहतर कानून लाया। जिससे लोगों में यह धारणा कायम हुई की शराब एक बुरी चीज है। जिसका सामाजिक स्तर पर बहिष्कार किया जाना चाहिए । तथा अब किसी की मजाल नहीं कि वह खुलेआम शराब पीकर घूम सके या फिर खुलेआम शराब खरीद सके । तो मैंने कहा की कुल मिलाकर आप यह कहना चाहते हैं कि नीतीश कुमार ने शराबबंदी कानून के तहत शराब जैसी सामाजिक बुराई को ढक दिया।
                तो उन्होंने भी हाँ में अपना सर हिलाया। तो मैंने कहा - पर दहेज तो सदियों सदियों से ढका हुआ ही है। कोई भी खुलकर दहेज नहीं लेता। बंद कमरे में दो लोगों के बीच दहेज की बातें होती है।
               फिर उन्होंने मुझसे सवाल किया । तो फिर आपके हिसाब से क्या कदम उठाए जाने चाहिए?
मेरे हिसाब से आने वाली भावी पीढ़ी या जो बच्चे विद्यालयों में पढ़ रहे है । उन्हें दहेज के नफे-नुकसान के बारे में पूरी जानकारी देनी चाहिए। उन्हें बताना चाहिए कि दहेज किस प्रकार समाज के लिए, परिवार के लिए घातक साबित होता है । उन्हें दहेज के कानूनों के बारे में पूरी जानकारी देनी चाहिए। क्योंकि जब तक हम स्वयं में किसी भी सामाजिक बुराई से लड़ने को तैयार नहीं हो जाते, सरकार की चेष्ठा नहीं होती कि वह हमसे उस सामाजिक बुराई को बंद करवा ले। क्योंकि हत्या, अपहरण, रेप जैसे कृत्यों पर कानून कब के बन चुके हैं। पर वह आज भी हो रहे हैं। लेकिन एक बड़ा वर्ग है ,जो यह मान चुका है अपने मन ही मन में ,की ये चीजें गलत है। ये चीजें नहीं करनी है । क्योंकि वह बड़ा वर्ग मानसिक रूप से तैयार है यह मानने के लिए कि क्या गलत है और क्या सही है । ठीक उसी प्रकार हमें आने वाली पीढ़ी को भी मानसिक रूप से तैयार करना होगा दहेज के खिलाफ भी।
 
        यह तो रही आने वाली पीढ़ी की बातें। वर्तमान के माता पिताओं को भी खुद में यह संकल्प लेना होगा कि किसी भी लड़की के विवाह में वह दहेज नहीं देंगे। और यह संकल्प हर लड़की के पिता को लेना ही होगा ।क्योंकि इस चक्र में अगर एक भी जगह किसी ने दहेज दिया जाता है , तो यह चक्र टूट जाएगा । क्योंकि अगर एक आदमी दहेज के लालच में तीन जगह अपनी शादियां तोड़ चुका और चौथे , पांचवें और छठे जगह भी एक लड़की का पिता दहेज़ देने से मना कर देता है । तो लड़के की मजबूरी हो जाएगी बिना दहेज के विवाह करने की। क्योंकि अगर ऐसा नहीं किया उसने तो वह कुंवारा रह जायेगा।
          ऊपर की दोनों बातें सामाजिक स्तर पर थी। पर प्रशासनिक या कानूनी रूप से कहा जाए तो सरकार इसके लिए बकायदा एक सख्त कानून तैयार करें। और हर विवाह के बाद बारातियों के साथ जा रही ट्रक ,टैक्सी और पिकअप को चेक किया जाए । मुझे लगता है इन उपायों से दहेज पर काबू पाया जा सकता है ।
               बाल विवाह के लिए परिवारों को शिक्षित करना अति आवश्यक है। बहुत बड़े स्तर पर नहीं तो कम से कम उन्हें यह बताना आवश्यक है कि कम उम्र में विवाह करने पर एक लड़की को किस प्रकार की कठिन परिस्थितियों का सामना करना पड़ता है । शारीरिक समस्याओं का सामना करना पड़ता है । क्योंकि बाल विवाह के केस में ज्यादा परेशानियां चुकी लड़कियों को ही होती है । इसलिए लड़कियों के मां-बाप को आंगनवाड़ी ,सेविका ,आशा तथा प्राथमिक स्तर पर जो भी सरकारी संस्थाएं कार्यरत हैं उन्हें आगे बढ़कर अपने गांव अपने वार्ड में यह जागरुकता फैलाने होगी ।
इस तरह से मुझे लगता है की दहेज़ और बाल विवाह से निजात पाने का एक उपाय यह साबित हो सकता है।
Gunjan ki KALAM se

Monday, January 15, 2018

विपक्ष विहीन राजनीति की ओर, अग्रसर होता भारत।


अक्सर राजनीति एवं लोकतंत्र जैसे शब्द सुनने के साथ ही हमारे मन में जो पहली बात उठती है, वो है अलग-अलग राजनीतिक पार्टियां। मज़ा भी आता है इनके कारनामों की चर्चा करने में। पर राजनीति केवल व्यवहारिक नहीं होती इसके इतर एक राजनीति होती है, सैद्धांतिक राजनीति। वो राजनीति जो आज लुप्त हो चुकी है। लोकतंत्र इसी सैद्धांतिक राजनीति रूपी स्तंभ पर खड़ा है। कहते हैं राजनीति में दिशा और दशा सदैव एक समान नहीं रहती। विशेष रूप से भारत जैसे विशाल देश में। यहां राजनीति का स्वरूप सदैव बदलता रहता है और यह ज़रूरी भी है।
हम अगर लोकतंत्र के जन्म अथवा औचित्य पर विचार करेंगे तो यह पाएंगे कि लोकतंत्र का जन्म राजतंत्र अथवा तानाशाही शासन को समाप्त कर जनता द्वारा चुने नुमाइंदों को शासन या सेवा के लिए नियुक्त करने को हुआ था। पर लगता नहीं कि लोकतंत्र राजशाही का सफल विकल्प था। लोकतंत्र बिल्कुल जनता द्वारा चुने गए तानाशाहों की तरह कार्य कर रहा है।
शुरुआती असफलताओं से लड़ते हुए भारत ने अपना संविधान बनाया। उम्मीद थी कि यह लोकतंत्र एवं संविधान देश को विश्व पटल पर एक नई उम्मीद के साथ उभारेगा। पर वर्तमान स्थिति को देखा जाए तो यह एक चिंताजनक बिंदु है। आजादी के 70 साल बाद भी अगर देश में धार्मिक एवं जातिगत चुनाव, गोमांस, आजादी, मंदिर, हिंदूराष्ट्र अथवा वोट बैंक और घोटाले जैसे शब्दों एवं मुद्दों के आधार पर चुनाव हो रहे हैं या जीते जा रहे हैं तो निश्चित ही हम पतन की ओर जा रहे हैं।
इन सब के ऊपर जो मुद्दा सबसे चिंतित करने वाला है, वह यह है कि भारत जैसे विशाल लोकतंत्र में सत्ता पक्ष से अधिक जिम्मेदारी विपक्ष की है और कभी भी देश को एक मजबूत विपक्ष नहीं मिल सका। ऐसा विपक्ष जो अलग-अलग मुद्दों पर सरकार की नीतियों की निंदा कर सके और देशहित के मुद्दों पर सरकार का साथ दे।
अब अगर वर्तमान चुनावों की बात करें तो कांग्रेस या भाजपा कहीं भी अपने एजेंडे या एक सोच के साथ सत्ता में नहीं आई। बल्कि पिछली सत्ता के विकल्प के रूप में आई। जनता वर्तमान सरकारों से त्रस्त थी इसलिए विकल्प के तौर पर इन पार्टियों को सत्ता सौंपी गई। इन सब बातों में वह विपक्ष कहां है जो खुद को इन सरकारों की नीतियों से बेहतर साबित कर सके। वह विकल्प कहां है? जिस पर जनता विचार करे।
हिंदू वोट, मुस्लिम-यादव वोट, ओबीसी वोट बैंक, दलित वोट बैंक। क्या इन्ही मुद्दों के दम पर चुनाव लड़े एवं जीते जाएंगे? क्या चुनाव तक ही संविधान सीमित है? चाहे राष्ट्रीय स्तर पर यूपीए हो या बिहार में बीजेपी, मध्यप्रदेश में कांग्रेस हो, या यूपी में बीएसपी/एसपी। सभी विपक्षी पार्टियां चुनाव हारने के बाद, खुद को एक मजबूत विपक्ष के रूप में तैयार ना करके अगले चुनाव की तैयारियों में लग जाती हैं।
एक और विचार यूं ही आया, आपसे कह रहा हूं। वर्तमान में गठबंधन की सरकारों एवं साथ मिलकर चुनाव लड़ने की परंपरा खूब चली है। दिन प्रतिदिन यह स्थिति बढ़ ही रही है। बिहार में एक तरफ जेडीयू-आरजेडी-कांग्रेस एवं अन्य छोटी पार्टियां थी। तो दूसरी तरफ बीजेपी-एलजेपी-आरएलएसपी तथा अन्य छोटी पार्टियां थी। पर भविष्य में तब क्या हो, जब ये सभी पार्टियां अर्थात बीजेपी-एलजेपी-आरएलएसपी-जेडीयू-आरजेडी-कांग्रेस एवं अन्य पार्टियां भी आपस में शक्ति के हिसाब से सीटों का बंटवारा कर ले। सभी निर्विरोध चुनाव जीत जाएं। कोई चुनाव खर्च नहीं। कोई प्रचार नहीं। सुकून की सत्ता, सभी को सत्ता, कोई विपक्ष नहीं, जो करो सब सही।
हो सकता है आप में से कुछ लोग कहें कि यह संभव नहीं है। पर हुजूर ये राजनीति है। उम्मीद तो नीतीश-लालू के भी साथ आने की नहीं थी। उम्मीद तो एक वोट से बीजेपी की सरकार गिराने वाले रामविलास और बीजेपी के भी साथ आने की नहीं थी। ऐसी बहुत सी बातें, बहुत से समीकरण हैं ,जो यूं ही संभव हो जाते हैं राजनीति में। पर वो जो सबसे घातक है संविधान के लिए, लोकतंत्र के लिए, देश के लिए, हमारे लिए , तुम्हारे लिए, वह है विपक्ष विहीन लोकतंत्र की ओर अग्रसर होता भारत।